झारखंड: अपहृत कैरव सुरक्षित लौटा, लेकिन अपराधी ‘अदृश्य’! क्या जमशेदपुर में लौट रहा है अपहरण का साया?

कैरव गांधी 14 दिन बाद सुरक्षित लौटे, लेकिन अपहरणकर्ताओं का कोई सुराग नहीं। 10 करोड़ की फिरौती, विदेशी कॉल और संगठित अपराध के संकेत ने जमशेदपुर की सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

झारखंड: अपहृत कैरव सुरक्षित लौटा, लेकिन अपराधी ‘अदृश्य’! क्या जमशेदपुर में लौट रहा है अपहरण का साया?
कैरव गांधी (फाइल फोटो)।

जमशेदपुर (Threesocieties.com Desk)। पूर्वी सिंहभूम जिले में बीते दो दशकों से कायम शांति को 13 जनवरी 2026 की एक घटना ने झकझोर कर रख दिया। युवा उद्यमी कैरव गांधी के अपहरण ने न केवल शहर की कानून-व्यवस्था पर सवाल खड़े किए, बल्कि पुराने काले दौर की यादें भी ताजा कर दीं।

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14 दिनों के बाद कैरव गांधी की सुरक्षित वापसी भले ही पुलिस और प्रशासन के लिए राहत की बात हो, लेकिन अपहरणकर्ताओं का अब तक अज्ञात रहना इस पूरे मामले को और भी रहस्यमय बना रहा है।

सुरक्षित वापसी, लेकिन अनसुलझी गुत्थी

कैरव गांधी अपने घर लौट आए हैं। परिवार, रिश्तेदार और व्यापारिक जगत ने राहत की सांस ली। लेकिन सवाल जस के तस हैं— आखिर अपहरण किसने किया? मास्टरमाइंड कौन था? और सबसे अहम—क्या अपराधी बिना किसी सौदे के बच निकले? पूर्वी सिंहभूम जिले के आपराधिक इतिहास में यह संभवतः पहला हाई-प्रोफाइल मामला है, जहां अपहरण की पुष्टि हुई, 10 करोड़ रुपये तक की फिरौती की मांग हुई लेकिन एक भी अपराधी गिरफ्तार नहीं हुआ

जब जमशेदपुर अपहरण का गढ़ माना जाता था

एक समय था, जब जमशेदपुर और आसपास के इलाके अपहरण उद्योग के लिए कुख्यात थे। कैरव गांधी मामला उन पुराने जख्मों को फिर हरा कर गया—

अजय सिंह (2004): 30 दिन बाद बरामदगी, विश्वनाथ गर्ग (2004): चांडिल से अपहरण, पटना से बरामद

कृष्णा भालोटिया (2006): बिहार के कुख्यात गिरोह की संलिप्तता, एक अपराधी मुठभेड़ में ढेर

इन मामलों के बाद पुलिस की सख्ती से स्थिति नियंत्रण में आई थी। लेकिन कैरव गांधी केस ने यह भरोसा डगमगा दिया है।

पहली बार अपराधी पूरी तरह ‘अदृश्य’

इस केस की सबसे चौंकाने वाली बात यही है कि
अपहृत सुरक्षित है, लेकिन अपहरणकर्ता गायब।

क्या यह पुलिस की रणनीतिक चुप्पी है?
या फिर अपराधियों ने सिस्टम से एक कदम आगे निकलकर सुरक्षित एग्जिट रूट बना लिया?

रणनीतिक धैर्य या मजबूरी?

विशेषज्ञ मानते हैं कि पुलिस ने जानबूझकर “Wait & Watch” की नीति अपनाई।
जल्दबाजी कैरव की जान पर भारी पड़ सकती थी।

तकनीकी सर्विलांस

साइकोलॉजिकल प्रेशर

इंटर-स्टेट इनपुट

इन सबके चलते कैरव की सकुशल वापसी संभव हुई।
लेकिन अपहरणकर्ताओं तक न पहुंच पाना, पुलिस की रणनीति पर बहस को जन्म देता है।

इंडोनेशिया से आई 10 करोड़ की कॉल

कैरव गांधी के पिता और चर्चित कारोबारी देवांग गांधी को
इंडोनेशिया (+62 कोड) से कई बार फिरौती कॉल आए।
रकम—10 करोड़ रुपये।

यह अंतरराष्ट्रीय डिजिटल एंगल जांच को और जटिल बना गया।

डीजीपी से लेकर राजनीति तक दबाव

मामले की गंभीरता को देखते हुएडीजीपी तदाशा मिश्रा खुद जमशेदपुर पहुंचीं और घटनास्थल का निरीक्षण किया।राजनीतिक दबाव भी कम नहीं था— भाजपा प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू का दौरा, विधायक सरयू राय की डीजीपी और एसएसपी से सीधी बातचीत, आंदोलन की चेतावनी। यह मामला सिर्फ अपराध नहीं, बल्कि राजनीतिक और सामाजिक मुद्दा बन गया था।

संगठित अपराध का खतरा फिर मंडराया

कैरव गांधी की सुरक्षित वापसी से एक बड़ी अनहोनी टल गई, लेकिन यह घटना खतरे की घंटी जरूर है।

औद्योगिक गतिविधियों के विस्तार के साथ
संगठित अपराध की वापसी की आशंका
उद्यमियों की सुरक्षा पर सवाल

अगर समय रहते सबक नहीं लिया गया, तोशहर फिर उसी दौर में जा सकता है, जिसे वह पीछे छोड़ चुका था।

अब निगाहें पुलिस की अगली चाल पर

फिलहाल, पूरा जमशेदपुर एक ही सवाल पूछ रहा है—
क्या पुलिस मास्टरमाइंड तक पहुंचेगी?
या यह केस सिर्फ “सुरक्षित वापसी” तक सिमट कर रह जाएगा?

 Threesocieties.com इस मामले से जुड़े हर नए खुलासे और जांच की दिशा पर पैनी नजर बनाये रखेगा।