झारखंड में 500 कस्टोडियल डेथ पर हाई कोर्ट गंभीर, सरकार से पूछा- क्या मानवाधिकार नियमों का पालन हुआ?

झारखंड हाई कोर्ट ने राज्य में 2018 से 2025 के बीच पुलिस और जेल हिरासत में हुई करीब 500 मौतों के मामले में सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया है। अदालत ने सरकार से पूछा है कि क्या सभी मामलों में न्यायिक जांच और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के दिशानिर्देशों का पालन किया गया था।

झारखंड में 500 कस्टोडियल डेथ पर हाई कोर्ट गंभीर, सरकार से पूछा- क्या मानवाधिकार नियमों का पालन हुआ?
झारखंड में 2018-2025 के बीच 500 मौतें ।

रांची (Threesocieties.com Desk): झारखंड में पुलिस और जेल हिरासत में हुई मौतों के मामलों को लेकर झारखंड हाई कोर्ट ने गुरुवार को बेहद महत्वपूर्ण सुनवाई की। राज्य में बढ़ती कस्टोडियल डेथ की घटनाओं पर दाखिल जनहित याचिका (PIL) पर सुनवाई पूरी होने के बाद अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया है।

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यह मामला इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि राज्य सरकार ने अदालत में स्वीकार किया है कि वर्ष 2018 से 2025 के बीच पुलिस और जेल कस्टडी में करीब 500 लोगों की मौत हुई है। इनमें से लगभग आधे मामलों में न्यायिक जांच नहीं होने की बात सामने आई है।

हाई कोर्ट ने सरकार से मांगा स्पष्ट जवाब

सुनवाई के दौरान अदालत ने गृह सचिव से यह स्पष्ट करने को कहा कि हिरासत में हुई मौतों के मामलों में क्या अनिवार्य न्यायिक जांच कराई गई थी या नहीं। कोर्ट ने यह भी पूछा कि जांच के दौरान राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) के दिशा-निर्देशों का पालन किया गया था या नहीं।

खंडपीठ ने सरकार के उस दावे पर भी सवाल उठाया जिसमें कहा गया था कि सभी मामलों की सूचना मजिस्ट्रेट को दी गई थी। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई ठोस दस्तावेज नहीं है जिससे यह साबित हो सके कि मजिस्ट्रेट स्तर पर वास्तविक जांच हुई थी।

सुप्रीम कोर्ट के फैसलों और BNSS का हवाला

याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला दिया गया। साथ ही राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के दिशा-निर्देश और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 196(2) का उल्लेख करते हुए कहा गया कि हिरासत में मौत के मामलों में स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कानूनी रूप से अनिवार्य है। याचिकाकर्ता का कहना है कि कई मामलों में प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया, जिससे पीड़ित परिवारों को न्याय नहीं मिल सका।

आधे मामलों में न्यायिक जांच नहीं!

पूर्व में दाखिल शपथ पत्र में गृह सचिव ने स्वीकार किया था कि 2018 से 2025 के बीच हुई करीब 500 मौतों में बड़ी संख्या में मामलों की न्यायिक जांच नहीं कराई गई। इस खुलासे के बाद अदालत ने मामले को गंभीर मानते हुए सरकार से विस्तृत जवाब मांगा था। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि कस्टोडियल डेथ के मामलों में पारदर्शिता की कमी और जांच प्रक्रिया में देरी लोकतांत्रिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

मुमताज अंसारी ने दाखिल की है PIL

यह जनहित याचिका मुमताज अंसारी की ओर से दाखिल की गई है। याचिका में अदालत से मांग की गई है कि राज्य में पुलिस, जेल और न्यायिक हिरासत में हुई मौतों की स्वतंत्र जांच कराई जाए और दोषियों पर कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। याचिका में यह भी कहा गया है कि हिरासत में मौत केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं बल्कि मानवाधिकारों के उल्लंघन का गंभीर मामला है।

फैसले पर टिकी निगाहें

अब पूरे मामले में झारखंड हाई कोर्ट के फैसले पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं। माना जा रहा है कि अदालत का निर्णय राज्य में कस्टोडियल डेथ मामलों की जांच प्रक्रिया, जवाबदेही और मानवाधिकार संरक्षण को लेकर बड़ा संदेश दे सकता है।