धनबाद BJP में बवाल: महानगर जिला उपाध्यक्ष धनेश्वर महतो हुए पदमुक्त, बढ़ी सियासी गर्मी

धनबाद भाजपा में अंदरूनी विवाद गहरा गया है। महानगर उपाध्यक्ष धनेश्वर Mahato को अनुशासनहीनता के आरोप में शो-कॉज नोटिस जारी किया गया है। खो कॉज के जबाव से असंतुष्ट होने के बाद उन्हें पदमुक्त कर दिया गया है। प्रशिक्षण शिविर में मोबाइल ले जाने को लेकर हुए विवाद के बाद यह कार्रवाई हुई है, जिससे कोयलांचल भाजपा की राजनीति और गर्मा गई है।

धनबाद BJP में बवाल: महानगर जिला उपाध्यक्ष धनेश्वर महतो हुए पदमुक्त,  बढ़ी सियासी गर्मी
महानगर उपाध्यक्ष धनेश्वर महतो (फाइल फोटो)।
  • प्रशिक्षण शिविर के विवाद ने पकड़ा तूल, भाजपा ने धनेश्वर महतो को थमाया नोटिस
  • मोबाइल विवाद से शुरू हुई लड़ाई, अब शो-कॉज तक पहुंची बात

धनबाद (Threesocieties.com Desk) : कोयलांचल भाजपा में लंबे समय से चल रही अंदरूनी खींचतान अब खुलकर सामने आने लगी है। भाजपा महानगर उपाध्यक्ष धनेश्वर महतो को अनुशासनहीनता के आरोप में पदमुक्त कर दिया गया है। इससे पहले उन्हें शो-कॉज नोटिस जारी किया गया था। यह कार्रवाई भाजपा महानगर अध्यक्ष श्रवण राय ने प्रदेश नेतृत्व के निर्देश पर की है।

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बताया जा रहा है कि हाल ही में आयोजित भाजपा के प्रशिक्षण शिविर के दौरान धनेश्वर महतो और महानगर महामंत्री मानस प्रसून के बीच तीखा विवाद हो गया था। विवाद की वजह मोबाइल फोन को लेकर बनी। सूत्रों के अनुसार धनेश्वर महतो प्रशिक्षण शिविर में मोबाइल लेकर जाना चाहते थे, जिसका मानस प्रसून ने विरोध किया। इसी बात को लेकर दोनों नेताओं के बीच कहासुनी बढ़ गई। मामला इतना बढ़ा कि स्थिति संभालने के लिए स्वयं सांसद ढुलू महतो को हस्तक्षेप करना पड़ा। उनके हस्तक्षेप के बाद विवाद शांत हुआ और धनेश्वर महतो शिविर में शामिल हुए। लेकिन शिविर खत्म होते ही अगले दिन धनेश्वर महतो को शो-कॉज नोटिस थमा दिया गया। इसके बाद उन्हें सभी पदों से हटा दिया गया।

प्रदेश नेतृत्व तक पहुंचा मामला

भाजपा सूत्रों का कहना है कि मामला सीधे प्रदेश नेतृत्व तक पहुंचाया गया था। प्रदेश से मिले संकेत के बाद ही महानगर अध्यक्ष श्रवण राय ने कार्रवाई की। यही कारण है कि इस नोटिस को सामान्य संगठनात्मक कार्रवाई नहीं माना जा रहा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम भाजपा के भीतर शक्ति संतुलन का संकेत भी हो सकता है। 

भाजपा में क्या बदल रहा है संदेश?

भाजपा के अंदर इस कार्रवाई को एक बड़े राजनीतिक संदेश के तौर पर भी देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि प्रदेश नेतृत्व यह संकेत देना चाहता है कि संगठन में अनुशासन सर्वोपरि है और किसी भी नेता का प्रभाव संगठनात्मक नियमों से ऊपर नहीं है।