झारखंड: “सरना सनातन एक नहीं…” : डीएसपी किशोर रजक के पोस्ट से छिड़ी नई बहस
झारखंड के डीएसपी किशोर कुमार रजक ने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि सरना और सनातन एक नहीं हैं। उन्होंने आदिवासी संस्कृति को हिंदू धर्म से अलग बताते हुए इतिहास, जनगणना और संविधान सभा के संदर्भ दिए। पोस्ट के बाद नई बहस छिड़ गई है।
- जनगणना के बीच डीएसपी किशोर रजक का बड़ा दावा, बोले- ‘आदिवासी संस्कृति हजारों साल पुरानी’
- डीएसपी किशोर रजक ने सोशल मीडिया पोस्ट से बढ़ाई सियासी-धार्मिक हलचल
- ब्रिटिश जनगणना से संविधान सभा तक… डीएसपी किशोर रजक ने रखे ऐतिहासिक तर्क
- झारखंड में फिर गरमाया सरना बनाम सनातन विवाद
रांची (Threesocieties.com Desk) : अक्सर अपने बयानों और सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर चर्चा में रहने वाले झारखंड पुलिस के डीएसपी किशोर कुमार रजक एक बार फिर सुर्खियों में हैं। इस बार उन्होंने सरना धर्म और सनातन धर्म को लेकर ऐसा पोस्ट किया है, जिसने सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक और सामाजिक गलियारों तक नई बहस छेड़ दी है।
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देश में आगामी जनगणना और सरना धर्म कोड की मांग के बीच आदिवासी पहचान को लेकर चल रही चर्चाओं के दौरान डीएसपी किशोर रजक ने फेसबुक पर लंबा पोस्ट साझा किया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में लिखा कि “सरना सनातन एक नहीं है” और इस विषय पर अपनी प्रस्तावित किताब में विस्तार से लिखने की बात कही।
डीएसपी रजक ने दावा किया कि आदिवासी-सर्ना संस्कृति, ब्राह्मण धर्म, हिंदू धर्म और सनातन परंपरा से हजारों साल पुरानी है। उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक तथ्यों, दस्तावेजों और तर्कों के आधार पर वह इसे प्रमाणित कर सकते हैं। उन्होंने अपने पोस्ट में लिखा कि किसी भी हिंदू धार्मिक ग्रंथ में आदिवासियों को हिंदू धर्म का हिस्सा नहीं बताया गया है। साथ ही उन्होंने ब्रिटिश कालीन जनगणना का हवाला देते हुए कहा कि वर्ष 1871 से 1941 तक आदिवासियों के लिए अलग कॉलम मौजूद था, जिसमें उन्हें “Aborigines”, “Tribal Religion” और “Animism” यानी प्रकृति पूजक के रूप में दर्ज किया गया था।
डीएसपी किशोर रजक ने आगे लिखा कि 1951 की जनगणना में “Tribal Religion” कॉलम हटाकर “Other Religions and Persuasions” कर दिया गया और 1961 में उस श्रेणी को भी समाप्त कर दिया गया। उन्होंने अपने पोस्ट में संविधान सभा के ऐतिहासिक संदर्भ का भी उल्लेख किया। डीएसपी रजक ने बताया कि संविधान सभा में 19 दिसंबर 1946 को जयपाल सिंह मुंडा ने डॉ. राजेंद्र प्रसाद के 1940 के रामगढ़ कांग्रेस अधिवेशन के भाषण का उद्धरण दिया था। उस भाषण में आदिवासियों को भारत का मूल निवासी बताते हुए उनकी संस्कृति को आर्यों से अलग और अत्यंत प्राचीन बताया गया था।
पोस्ट में उद्धृत भाषण के अनुसार, छोटानागपुर क्षेत्र की सभ्यता अत्यंत प्राचीन और विशिष्ट रही है तथा आदिवासी समुदाय की सांस्कृतिक पहचान अन्य समुदायों से अलग है। डीएसपी रजक ने अपने पोस्ट के अंत में दोबारा दोहराया कि “फिर से कहता हूं, सरना और सनातन बिल्कुल भी एक नहीं है।”
डीएसपी के इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर बहस तेज हो गई है। एक ओर आदिवासी संगठनों और सरना धर्म कोड समर्थकों ने उनके विचारों का समर्थन किया, वहीं कई लोगों ने इसे धार्मिक और सामाजिक विवाद को बढ़ाने वाला बयान बताया।
झारखंड में लंबे समय से सरना धर्म को अलग धार्मिक पहचान देने की मांग उठती रही है। राज्य विधानसभा से सरना धर्म कोड का प्रस्ताव भी पारित हो चुका है। ऐसे में एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी का यह सार्वजनिक पोस्ट राजनीतिक और सामाजिक रूप से काफी अहम माना जा रहा है।






