फायर ब्रिक्स केस में बड़ी राहत: झारखंड हाईकोर्ट ने संजय-सचिन अग्रवाल को दी नियमित जमानत
झारखंड हाईकोर्ट ने गोविंदपुर फायर ब्रिक्स आपूर्ति विवाद मामले में व्यवसायी संजय कुमार अग्रवाल और सचिन कुमार अग्रवाल को नियमित जमानत दे दी। कोर्ट ने IBC प्रक्रिया, आंशिक भुगतान और व्यावसायिक विवाद के पहलुओं पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की।
HighLights
- न्यायालय ने माना कि मामला मुख्य रूप से व्यावसायिक लेन-देन और IBC प्रक्रिया से जुड़ा है
- बचाव पक्ष ने 74.86 लाख रुपये से अधिक भुगतान के दस्तावेज कोर्ट में प्रस्तुत किए
- NCLT में लंबित CIRP प्रक्रिया और स्वीकार किए गए ऑपरेशनल डेब्ट का दिया गया हवाला
- हाईकोर्ट ने कहा कि आगे हिरासत में रखने से कोई न्यायिक उद्देश्य पूरा नहीं होगा
रांची (Threesocieties.com Desk): झारखंड उच्च न्यायालय ने चर्चित फायर ब्रिक्स (अग्नि सह ईंट) आपूर्ति विवाद मामले में व्यवसायी संजय कुमार अग्रवाल और सचिन कुमार अग्रवाल को नियमित जमानत प्रदान कर दी है। गोविंदपुर थाना कांड संख्या 498/2025 से जुड़े इस मामले में पारित आदेश को व्यावसायिक विवादों और दिवाला प्रक्रिया से जुड़े मामलों के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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माननीय न्यायमूर्ति अनिल कुमार चौधरी की एकल पीठ ने बी.ए. संख्या 4824/2026 एवं बी.ए. संख्या 4696/2026 पर सुनवाई करते हुए यह आदेश पारित किया। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता शैलेश कुमार सिंह ने अदालत के समक्ष विस्तृत पक्ष रखा।
बचाव पक्ष ने क्या रखा तर्क?
सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने दावा किया कि पूरे मामले को एक साधारण व्यावसायिक लेन-देन और ऋण विवाद से हटाकर आपराधिक स्वरूप देने का प्रयास किया गया है। अदालत के समक्ष प्रस्तुत दस्तावेजों के अनुसार, फायर ब्रिक्स की कुल आपूर्ति लगभग 1.56 करोड़ रुपये की थी, जिसके बदले याचिकाकर्ता की कंपनी द्वारा 74.86 लाख रुपये से अधिक का भुगतान पहले ही किया जा चुका था।बचाव पक्ष ने आरोप लगाया कि शिकायतकर्ता द्वारा इन भुगतानों का उल्लेख नहीं किया गया और केवल शेष बकाया राशि के आधार पर धोखाधड़ी एवं आपराधिक विश्वासघात की कहानी प्रस्तुत की गई।
NCLT और IBC प्रक्रिया का भी हुआ उल्लेख
अदालत को यह भी बताया गया कि याचिकाकर्ता की कंपनी विमला फ्यूल्स एंड मेटल्स लिमिटेड को 6 अक्टूबर 2025 को NCLT अहमदाबाद बेंच द्वारा कॉर्पोरेट इन्सॉल्वेंसी रेजोल्यूशन प्रोसेस (CIRP) में स्वीकार किया जा चुका है। बचाव पक्ष के अनुसार, शिकायतकर्ता की फर्म पैरामाउंट ट्रेडर्स ने भी कथित बकाया राशि 81.22 लाख रुपये की वसूली के लिए रेजोल्यूशन प्रोफेशनल के समक्ष दावा प्रस्तुत किया था, जिसे सत्यापित कर परिचालन ऋण (Operational Debt) के रूप में स्वीकार किया गया।
धोखाधड़ी और विश्वासघात के आरोपों पर उठे सवाल
सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय के विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए बचाव पक्ष ने तर्क दिया कि किसी संरचित व्यावसायिक खरीद व्यवस्था में धोखाधड़ी और आपराधिक विश्वासघात के आरोपों का एक साथ टिक पाना कानूनी रूप से कठिन है।दलील दी गई कि यदि लेन-देन बैंकिंग चैनलों के माध्यम से हुआ हो और आंशिक भुगतान के पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध हों, तो प्रारंभिक स्तर पर आपराधिक मंशा (Mens Rea) सिद्ध करना आसान नहीं होता।
हाईकोर्ट की महत्वपूर्ण टिप्पणी
मामले की केस डायरी, निचली अदालत के रिकॉर्ड और हालिया कॉर्पोरेट दस्तावेजों की समीक्षा के बाद उच्च न्यायालय ने पाया कि संबंधित वित्तीय दावों और संपत्तियों का प्रबंधन IBC, 2016 के तहत रेजोल्यूशन प्रोफेशनल की निगरानी में चल रहा है।न्यायालय ने माना कि जब वैधानिक प्रक्रिया के तहत दावों का सत्यापन और निस्तारण जारी है, तब अभियुक्तों को निरंतर हिरासत में रखने से कोई विशेष न्यायिक उद्देश्य पूरा नहीं होगा। अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि बैंकिंग माध्यमों से किए गए पर्याप्त भुगतान प्रारंभिक आपराधिक मंशा के आरोपों को कमजोर करते हैं।
व्यावसायिक विवादों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा फैसला
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदेश उन मामलों में महत्वपूर्ण नजीर साबित हो सकता है, जहां व्यावसायिक लेन-देन, ऋण वसूली और दिवाला प्रक्रिया से जुड़े विवादों को आपराधिक मुकदमों के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। हालांकि मामले के मूल आरोपों और अन्य कानूनी पहलुओं पर अंतिम निर्णय ट्रायल और संबंधित वैधानिक प्रक्रियाओं के बाद ही होगा। फिलहाल, झारखंड उच्च न्यायालय के इस आदेश से संजय कुमार अग्रवाल और सचिन कुमार अग्रवाल को बड़ी राहत मिली है।






