धार भोजशाला पर ऐतिहासिक फैसला: MP हाई कोर्ट ने कहा- ‘यह सरस्वती मंदिर’, नमाज पर रोक
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर बेंच ने धार भोजशाला को सरस्वती मंदिर करार देते हुए नमाज पर रोक लगा दी है। कोर्ट ने ASI के 2003 आदेश को आंशिक रूप से रद्द किया और मुस्लिम पक्ष को वैकल्पिक जमीन के लिए आवेदन करने की बात कही।
- भोजशाला विवाद में हिंदू पक्ष की बड़ी जीत,हाई कोर्ट ने माना सरस्वती मंदिर
- इंदौर हाई कोर्ट के फैसले से बदली 22 साल पुरानी व्यवस्था
- अब सिर्फ पूजा होगी, नमाज पर रोक,मुस्लिम पक्ष को वैकल्पिक जमीन का सुझाव
- हिंदुओं को मिला पूर्ण पूजा अधिकार, मुस्लिम पक्ष जाएगा सुप्रीम कोर्ट
भोपाल (Threesocieties.com Desk): मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने शुक्रवार को धार स्थित बहुचर्चित भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद विवाद पर ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए भोजशाला परिसर को वाग्देवी मां सरस्वती का मंदिर माना है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि विवादित परिसर का धार्मिक स्वरूप मंदिर का है और यहां हिंदू पूजा-अर्चना की परंपरा कभी समाप्त नहीं हुई।
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जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की डिवीजन बेंच ने अपने फैसले में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के 2003 के उस आदेश को आंशिक रूप से रद्द कर दिया, जिसके तहत हिंदुओं को सीमित पूजा अधिकार और मुस्लिम समुदाय को शुक्रवार को नमाज की अनुमति दी गई थी। अब कोर्ट के फैसले के बाद भोजशाला परिसर में नमाज नहीं हो सकेगी और हिंदू पक्ष को पूजा-अर्चना का अधिकार मिलेगा।
मुस्लिम पक्ष को वैकल्पिक जमीन का सुझाव
हाई कोर्ट ने कहा कि यदि मुस्लिम पक्ष मस्जिद निर्माण के लिए सरकार को आवेदन देता है, तो उसे वैकल्पिक जमीन उपलब्ध कराई जा सकती है। अदालत ने यह भी कहा कि केंद्र सरकार और ASI भोजशाला मंदिर के प्रशासन और प्रबंधन को लेकर उचित निर्णय लें।
अदालत ने क्या कहा?
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ऐतिहासिक साहित्य, पुरातात्विक साक्ष्य और ASI सर्वेक्षण यह साबित करते हैं कि भोजशाला परिसर परमार वंश के राजा भोज से जुड़ा संस्कृत अध्ययन केंद्र और देवी सरस्वती का मंदिर था। अदालत ने माना कि हिंदू पूजा की परंपरा यहां कभी समाप्त नहीं हुई। पीठ ने कहा कि श्रद्धालुओं को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराना, कानून-व्यवस्था बनाए रखना और स्थल की पवित्रता का संरक्षण करना राज्य का संवैधानिक दायित्व है।
ASI के सर्वेक्षण रिपोर्ट को मिली अहमियत
हाई कोर्ट ने 11 मार्च 2024 को ASI को भोजशाला परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण करने का आदेश दिया था। ASI ने 22 मार्च 2024 से 98 दिनों तक विस्तृत सर्वेक्षण किया और 15 जुलाई 2024 को अपनी रिपोर्ट कोर्ट में सौंपी। करीब 2000 पन्नों की रिपोर्ट में ASI ने संकेत दिए थे कि वर्तमान ढांचा मंदिर के अवशेषों और स्थापत्य सामग्री का उपयोग कर निर्मित किया गया था। सर्वेक्षण के दौरान मिले शिलालेख, मूर्तियां, सिक्के और स्थापत्य अवशेष हिंदू पक्ष के दावों के समर्थन में बताए गए। हालांकि मुस्लिम पक्ष ने ASI रिपोर्ट को पक्षपातपूर्ण बताया था, लेकिन ASI ने अदालत में कहा कि सर्वेक्षण पूरी वैज्ञानिक प्रक्रिया और विशेषज्ञों की निगरानी में किया गया।
हिंदू पक्ष में खुशी की लहर
फैसले के बाद हिंदू संगठनों और मंदिर पक्ष में खुशी की लहर दौड़ गई। इंदौर हाई कोर्ट के बाहर समर्थकों ने मिठाइयां बांटी और जयकारे लगाए। मंदिर पक्ष के अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने फैसले का स्वागत करते हुए कहा कि “यह हिंदू समाज की आस्था और ऐतिहासिक सच्चाई की जीत है। हिंदुओं को पूजा का अधिकार मिला है।”
सुप्रीम कोर्ट जाएगा मुस्लिम पक्ष
मस्जिद पक्ष की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद, अरशद वारसी और शोभा मेनन ने अदालत में पक्ष रखा था। फैसले के बाद मुस्लिम पक्ष ने संकेत दिए हैं कि वे इस निर्णय को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे।
वाग्देवी प्रतिमा को लेकर भी टिप्पणी
मामले की सुनवाई के दौरान हिंदू पक्ष ने लंदन के संग्रहालय में रखी मां वाग्देवी की प्रतिमा को भारत वापस लाने की मांग उठाई थी। इस पर हाई कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार इस मांग पर विचार कर सकती है।
क्या है भोजशाला विवाद?
धार स्थित भोजशाला परिसर को लेकर दशकों से विवाद चल रहा है। हिंदू पक्ष इसे मां सरस्वती का प्राचीन मंदिर और संस्कृत शिक्षा केंद्र मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद बताता रहा है। अब तक यहां विशेष व्यवस्था लागू थी, जिसके तहत मंगलवार को हिंदुओं को पूजा और शुक्रवार को मुस्लिम समुदाय को नमाज की अनुमति दी जाती थी। हाई कोर्ट के ताजा फैसले ने इस व्यवस्था को बदल दिया है।
सुरक्षा के कड़े इंतजाम
फैसले को देखते हुए धार जिले में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी कर दी गई है। प्रशासन ने संवेदनशील इलाकों में भारी पुलिस बल तैनात किया है और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 163 लागू कर दी गई है। पुलिस लगातार गश्त कर रही है और प्रशासन पूरी स्थिति पर नजर बनाए हुए है।
भोजशाला-कमाल मौला विवाद
भोजशाला को हिंदू पक्ष मां सरस्वती का प्राचीन मंदिर और संस्कृत अध्ययन केंद्र मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद बताता रहा है। यही दोहरे दावे दशकों से विवाद की जड़ बना हुए था। अभी तक तय व्यवस्था के अनुसार यहां अलग-अलग दिनों में पूजा और नमाज की अनुमति दी जाती रही है। लेकिन अब मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए मुस्लिम पक्ष के नमाज पर रोक लगा दी है। यहां सिर्फ हिंदू पक्ष पूजा कर सकेंगे।
राजा भोज से कोर्ट तक- विवाद की संक्षिप्त टाइमलाइन
1010-1055 : राजा भोज का शासनकाल।
1034 : सरस्वती सदन निर्माण का उल्लेख।
1305-1409 : मालवा पर आक्रमण और संरचनात्मक बदलाव।
1459 : कमाल मौला से जुड़ी संरचना का उल्लेख।
1875 : खुदाई में वाग्देवी प्रतिमा मिलने का दावा।
1909 : परिसर को संरक्षित स्मारक घोषित किया गया।
1934 : भोजशाला और कमाल मौला मस्जिद को लेकर प्रशासनिक आदेश।
1952 : वसंत पंचमी पर भोज उत्सव।
2003 : पूजा और नमाज की अलग-अलग दिन व्यवस्था लागू।
2022 : हाई कोर्ट में नई रिट याचिका दाखिल।
2024 : एएसआई सर्वे का आदेश।
2026 : हाई कोर्ट ने भोजशाला परिसर को मंदिर माना।
एएसआई सर्वे में क्या-क्या मिला?
एएसआई की 2000 से अधिक पेज की रिपोर्ट में परिसर में मंदिर शैली के अवशेष, मूर्तियां, स्तंभ, शिलालेख और स्थापत्य सामग्री मिलने का उल्लेख किया गया। रिपोर्ट में कहा गया कि वर्तमान ढांचे में पूर्ववर्ती संरचनाओं के हिस्सों का उपयोग हुआ। सर्वे के दौरान वैज्ञानिक तकनीकों, खुदाई और ग्राउंड पेनेट्रेटिंग रडार का उपयोग किया गया।
एएसआई रिपोर्ट के प्रमुख दावे
परिसर में परमारकालीन विशाल संरचना होने के संकेत।
106 स्तंभ और 82 पिलास्टर मंदिर संरचनाओं से जुड़े बताए गए।
संस्कृत और प्राकृत शिलालेख अरबी-फारसी अभिलेखों से पुराने बताए गए।
कई मूर्तियों और आकृतियों को क्षतिग्रस्त अवस्था में मिलने का उल्लेख।
रिपोर्ट में कहा गया कि बाद की संरचना जल्दबाजी में बनाई गई प्रतीत होती है।
98 दिन चला वैज्ञानिक सर्वे
हाई कोर्ट के आदेश के बाद एएसआई ने 98 दिन तक वैज्ञानिक सर्वे किया। इसमें पुरातत्वविद, तकनीकी विशेषज्ञ और संरचना विश्लेषक शामिल रहे। सर्वे टीम का नेतृत्व एएसआई के अतिरिक्त महानिदेशक आलोक त्रिपाठी ने किया। रिपोर्ट 10 वाल्यूम में अदालत में पेश की गई।
अहम माना गया संस्कृत शिलालेख
एएसआई रिपोर्ट में 150 से अधिक संस्कृत और प्राकृत अभिलेखों का जिक्र किया गया है। इनमें कई अभिलेख नागरी लिपि में बताए गए हैं और उनका संबंध परमार शासकों से जोड़ा गया। रिपोर्ट के अनुसार ये अभिलेख अरबी-फारसी लेखों से पुराने हैं।
विवाद में वाग्देवी प्रतिमा भी बड़ा मुद्दा
विवाद में मां वाग्देवी की प्रतिमा का मुद्दा भी प्रमुख रहा है। रिकार्ड के अनुसार 1875 में खुदाई के दौरान प्रतिमा मिलने का उल्लेख है। बाद में ब्रिटिश अधिकारी इसे इंग्लैंड ले गए। हिंदू संगठनों ने कई बार प्रतिमा को वापस भारत लाने की मांग उठाई।
2003 की व्यवस्था बनी विवाद की धुरी
2003 में लागू व्यवस्था के तहत मंगलवार को हिंदू पक्ष को पूजा और शुक्रवार को मुस्लिम पक्ष को नमाज की अनुमति दी गई। जब वसंत पंचमी और शुक्रवार एक ही दिन पड़ते हैं, तब विवाद और तनाव की स्थिति बनती रही है।
कोर्ट में किस आधार पर पहुंचा मामला?
2022 में हिंदू फ्रंट फार जस्टिस और भोज उत्सव समिति से जुड़े पक्षकारों ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर परिसर के मूल स्वरूप की वैज्ञानिक जांच की मांग की। याचिका में एएसआई सर्वे, खुदाई और धार्मिक अधिकार तय करने की मांग शामिल थी।






