धर्म और संविधान पर भिड़े झारखंड के IRS और DSP, सोशल मीडिया पर छिड़ी बहस हुई वायरल
झारखंड में IRS अधिकारी निशा उरांव और DSP किशोर रजक के बीच मिशनरी स्कूलों, धार्मिक प्रार्थना और संवैधानिक अधिकारों को लेकर सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई है। दोनों अधिकारियों की पोस्ट वायरल होने के बाद धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत अधिकारों पर नई चर्चा शुरू हो गई है।
Highlights:
- मिशनरी स्कूलों में धार्मिक प्रार्थना और सनातनी परंपराओं को लेकर सोशल मीडिया पर बहस
- IRS अधिकारी निशा उरांव और DSP किशोर रजक ने रखे अपने-अपने तर्क
- धार्मिक शिक्षा और प्रार्थना को लेकर संविधान के प्रावधानों की चर्चा
- सोशल मीडिया पर दोनों अधिकारियों की पोस्ट तेजी से वायरल
- धार्मिक स्वतंत्रता और व्यक्तिगत पसंद के अधिकार पर नई बहस शुरू
रांची (Threesocieties.com Desk): झारखंड में भारतीय राजस्व सेवा (IRS) और राज्य पुलिस सेवा के दो वरिष्ठ अधिकारियों के बीच सोशल मीडिया पर शुरू हुई बहस इन दिनों चर्चा का विषय बनी हुई है। मिशनरी स्कूलों में होने वाली प्रार्थना, सनातनी परंपराओं और धार्मिक स्वतंत्रता से जुड़े मुद्दों पर दोनों अधिकारियों ने अपने-अपने विचार सार्वजनिक रूप से साझा किए हैं, जिसके बाद यह मामला सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया है।
यह भी पढ़ें: बिहार: मोकामा में गैंगस्टर सोनू-मोनू गैंग पर पुलिस का शिकंजा, पिता प्रमोद सिंह गिरफ्तार
पूरा विवाद उस समय शुरू हुआ जब IRS अधिकारी निशा उरांव ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट साझा करते हुए मिशनरी स्कूलों में होने वाली दैनिक प्रार्थना और धार्मिक गतिविधियों को लेकर सवाल उठाया। उन्होंने अपनी पोस्ट में कहा कि मिशनरी स्कूलों में वर्षों से प्रभु यीशु की स्तुति और भजन कराए जाते रहे हैं, लेकिन इस पर कभी व्यापक आपत्ति नहीं हुई। ऐसे में यदि किसी संस्थान में सनातन परंपराओं के तहत मंत्रोच्चारण या धार्मिक प्रार्थना होती है तो उस पर सवाल क्यों खड़े किए जाते हैं।
उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए लिखा कि वह स्वयं कुछ समय तक मिशनरी स्कूल में पढ़ी थीं, जहां छात्रों को नियमित रूप से प्रभु यीशु की प्रार्थना और भजन का अभ्यास कराया जाता था। उनके अनुसार, यह सभी विद्यार्थियों के लिए अनिवार्य था और उस समय किसी सनातनी परिवार ने इसका विरोध नहीं किया था। उन्होंने सवाल उठाया कि यदि उस व्यवस्था को स्वीकार किया गया था तो अब आपत्ति क्यों हो रही है।
DSP किशोर रजक ने दिया संवैधानिक जवाब
IRS अधिकारी की पोस्ट के बाद झारखंड पुलिस सेवा के अधिकारी और DSP किशोर रजक ने संविधान के प्रावधानों का हवाला देते हुए विस्तृत प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा कि भारत का संविधान अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता और धार्मिक संस्थानों को अपने प्रबंधन का अधिकार देता है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि अनुच्छेद 28 के अनुसार पूर्ण रूप से सरकारी वित्त पोषण वाले संस्थानों में धार्मिक शिक्षा और प्रार्थना पर प्रतिबंध लागू होता है, जबकि निजी धार्मिक और अल्पसंख्यक संस्थान संविधान की सीमाओं के भीतर अपनी धार्मिक गतिविधियां जारी रख सकते हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी कहा कि यदि कोई संस्थान सरकारी सहायता या अनुदान प्राप्त करता है तो वह किसी छात्र को उसकी इच्छा या अभिभावकों की सहमति के बिना धार्मिक गतिविधियों में भाग लेने के लिए बाध्य नहीं कर सकता।
अन्य धार्मिक संस्थानों का भी दिया उदाहरण
DSP किशोर रजक ने अपने जवाब में कहा कि केवल मिशनरी स्कूल ही नहीं बल्कि देश में कई अन्य धार्मिक संस्थानों में भी उनकी परंपराओं के अनुरूप प्रार्थनाएं होती हैं। उन्होंने विद्या भारती, सरस्वती शिशु मंदिर, रामकृष्ण मिशन, चिन्मय मिशन और गुरुकुल आधारित विद्यालयों का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां भी सरस्वती वंदना, गायत्री मंत्र और शांति पाठ जैसी धार्मिक प्रार्थनाएं होती हैं।उनका कहना था कि संविधान सभी धर्मों को अपने संस्थान संचालित करने और अपनी धार्मिक परंपराओं के अनुसार प्रार्थना कराने का अधिकार देता है। लेकिन किसी भी धर्म के छात्र पर उसकी इच्छा के विरुद्ध धार्मिक अनुष्ठान थोपना उचित नहीं माना जा सकता।
सोशल मीडिया पर छिड़ी नई बहस
दोनों अधिकारियों की पोस्ट सामने आने के बाद सोशल मीडिया पर बहस तेज हो गई है। एक वर्ग जहां धार्मिक स्वतंत्रता और सांस्कृतिक पहचान की बात कर रहा है, वहीं दूसरा वर्ग व्यक्तिगत पसंद और संवैधानिक अधिकारों को प्राथमिकता देने की वकालत कर रहा है।हालांकि, इस पूरे मामले में दोनों अधिकारियों ने अपने व्यक्तिगत विचार और संवैधानिक दृष्टिकोण सामने रखे हैं। इस विषय पर विभिन्न सामाजिक और धार्मिक समूहों के बीच भी चर्चा शुरू हो गई है।
संवेदनशील मुद्दे पर बढ़ी बहस
धार्मिक प्रार्थना, शिक्षा संस्थानों की स्वायत्तता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे मुद्दे लंबे समय से सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा रहे हैं। झारखंड के दो वरिष्ठ अधिकारियों के बीच सार्वजनिक रूप से सामने आई यह बहस एक बार फिर इन सवालों को राष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में ले आई है।






