21 की उम्र में लगा हत्या का आरोप, 64 में मिली बेगुनाही; हत्या के आरोपी को दिल्ली हाईकोर्ट ने किया बरी

दिल्ली हाईकोर्ट ने 1983 के 43 साल पुराने हत्या मामले में 64 वर्षीय मुकेश कुमार को सबूतों के अभाव में बरी कर दिया। अदालत ने गवाहों के बयानों और पहचान परेड (TIP) में गंभीर खामियां पाते हुए 2004 की उम्रकैद की सजा रद्द कर दी।

21 की उम्र में लगा हत्या का आरोप, 64 में मिली बेगुनाही; हत्या के आरोपी को दिल्ली हाईकोर्ट ने किया बरी
43 साल बाद दिल्ली हाईकोर्ट ने पलटा फैसला।

      HighLights:

  • 1983 के हत्या मामले में 64 वर्षीय मुकेश कुमार को दिल्ली हाईकोर्ट ने किया बरी
  • ट्रायल कोर्ट की 2004 की उम्रकैद की सजा हाईकोर्ट ने रद्द की
  • अदालत ने गवाहों के बयानों और पहचान परेड (TIP) में गंभीर खामियां पाईं
  • घटना के समय मुकेश कुमार केवल 21 साल के थे
  • 43 साल तक हत्या के मुकदमे का बोझ उठाने के बाद मिली राहत
  • अभियोजन पक्ष सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दाखिल कर सकता है

नई दिल्ली (Threesocieties.com Desk):  करीब चार दशक तक अदालतों के चक्कर, हत्या के आरोपी होने का सामाजिक बोझ और जिंदगी का सबसे अहम दौर कानूनी लड़ाई में गुजर जाने के बाद आखिरकार 64 वर्षीय मुकेश कुमार को राहत मिली है। दिल्ली हाईकोर्ट ने 1983 के चर्चित हत्या मामले में उन्हें सबूतों के अभाव में बरी कर दिया है। अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष उनके खिलाफ आरोपों को संदेह से परे साबित करने में पूरी तरह विफल रहा।

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यह मामला सिर्फ एक हत्या के मुकदमे का नहीं, बल्कि भारत की न्यायिक व्यवस्था में लंबी कानूनी प्रक्रियाओं और उनके मानवीय प्रभाव का भी उदाहरण बन गया है। जब यह मामला शुरू हुआ था, तब मुकेश कुमार महज 21 साल के थे। फैसला आने तक उनकी उम्र 64 साल हो चुकी थी।

1983 में डीटीसी बस में हुई थी वारदात

घटना 1 दिसंबर 1983 की है। शिकायतकर्ता उषा अपने दोस्तों के साथ लाजपत नगर में खरीदारी और डिनर करने के बाद डीटीसी की रूट नंबर 431 बस से लौट रही थीं। आरोप था कि बस में चढ़े कुछ युवकों ने महिलाओं के साथ अभद्रता की। जब उनके साथ मौजूद एक युवक ने इसका विरोध किया तो कथित तौर पर आरोपियों ने उस पर चाकू से हमला कर दिया। गंभीर चोटों के कारण युवक की मौत हो गई और पुलिस ने हत्या का मामला दर्ज किया।

मुकेश पर चाकू चलाने का नहीं, उकसाने का आरोप था

अभियोजन पक्ष का कहना था कि मुकेश कुमार ने खुद चाकू नहीं चलाया था, लेकिन वह बस के पिछले दरवाजे पर खड़े होकर अन्य आरोपियों को हमला करने के लिए उकसा रहे थे। उन पर आरोप था कि उन्होंने हमलावरों को "मारो..." कहकर भड़काया और पीड़ित पक्ष के साथ मारपीट भी की। इन्हीं आरोपों के आधार पर उनके खिलाफ हत्या और आर्म्स एक्ट के तहत मामला दर्ज किया गया।

21 साल बाद सुनाई गई थी उम्रकैद

मामले की सुनवाई वर्षों तक चलती रही। आखिरकार अगस्त 2004 में ट्रायल कोर्ट ने चार आरोपियों में से तीन को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई। तब तक एक आरोपी की मौत हो चुकी थी। मुकेश कुमार ने इस फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी, जिसके बाद उनकी सजा पर रोक लगा दी गई। हालांकि, इस दौरान वे लगभग 10 महीने जेल में भी रहे।

गवाहों के बयानों में मिले गंभीर विरोधाभास

दिल्ली हाईकोर्ट ने मामले की दोबारा सुनवाई के दौरान पाया कि अभियोजन पक्ष के प्रमुख गवाहों के बयान एक-दूसरे से मेल नहीं खाते।सबसे अहम गवाहों में शामिल बस कंडक्टर ने अदालत में कहा कि उसने न तो मुकेश कुमार को बस में चढ़ते देखा था और न ही उन्हें किसी को उकसाते हुए सुना था। इसके अलावा, बस में यात्रियों के बैठने की व्यवस्था और आरोपियों के बस में चढ़ने के क्रम को लेकर भी अलग-अलग गवाहों के बयान अलग थे। अदालत ने माना कि ऐसे विरोधाभास अभियोजन पक्ष के पूरे मामले को कमजोर करते हैं।

पहचान परेड (TIP) पर भी उठे सवाल

हाईकोर्ट ने टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (TIP) की प्रक्रिया को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि यह संदेह पैदा होता है कि क्या आरोपियों को पहचान परेड से पहले ही गवाहों को दिखा दिया गया था। यदि ऐसा हुआ था, तो पहचान परेड की विश्वसनीयता प्रभावित होती है और इसे ठोस साक्ष्य नहीं माना जा सकता।

पूरी जवानी मुकदमे की छाया में गुजर गई

1983 में जब यह घटना हुई थी, तब मुकेश कुमार पश्चिमी दिल्ली के तिलक नगर में रहने वाले 21 वर्षीय युवक थे। इस लंबे मुकदमे के दौरान उन्होंने 1986 में शादी की, बच्चों की परवरिश की और परिवार की जिम्मेदारियां निभाईं। उनका बेटा आज 36 साल का हो चुका है और बेटी 39 साल की है। लेकिन इस पूरी अवधि में हत्या के आरोपी होने का दाग और अदालतों में चल रही कानूनी लड़ाई उनके जीवन का हिस्सा बनी रही।

क्या मामला सुप्रीम कोर्ट जाएगा?

दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले के बाद भी कानूनी लड़ाई पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है। अभियोजन पक्ष ने संकेत दिए हैं कि वह इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका (SLP) के जरिए चुनौती दे सकता है। यदि ऐसा होता है, तो यह मामला देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच सकता है।

न्याय व्यवस्था पर फिर उठे सवाल

यह मामला एक बार फिर उस बहस को सामने लाता है कि अगर किसी व्यक्ति को दशकों बाद बेगुनाह पाया जाता है, तो उसकी जिंदगी के खोए हुए सालों की भरपाई कैसे होगी? अदालत का फैसला भले ही कानूनी राहत देता हो, लेकिन 43 साल तक चले मुकदमे में बीता समय कभी वापस नहीं लौट सकता। इस फैसले ने न्याय मिलने और न्याय मिलने में होने वाली देरी, दोनों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।