₹500 की घड़ी बनी कत्ल की वजह, 29 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने बंद की खून और इंसाफ की कहानी
देहरादून में 500 रुपये की घड़ी को लेकर शुरू हुआ मामूली विवाद हत्या में बदल गया था। 29 साल तक चली कानूनी लड़ाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस चर्चित मामले का निपटारा करते हुए दोषी की सजा कम कर दी।
HighLights:
- वर्ष 1997 में देहरादून में 500 रुपये की घड़ी को लेकर पड़ोसियों के बीच हुआ था विवाद
- मामूली कहासुनी हिंसा में बदल गई और पद्म सिंह की मौत हो गई
- स्थानीय अदालत ने 2002 में तीन आरोपियों को गैर-इरादतन हत्या का दोषी ठहराया था
- उत्तराखंड हाईकोर्ट ने 2012 में सजा को बरकरार रखा था
- 29 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने मामले का निपटारा करते हुए एकमात्र जीवित दोषी की सजा घटाई
- सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लंबी कानूनी प्रक्रिया और परिस्थितियों को देखते हुए मानवीय दृष्टिकोण अपनाया गया
नई दिल्ली (Threesocieties.com Desk): कभी-कभी एक छोटी सी बात इतनी बड़ी त्रासदी में बदल जाती है कि उसकी कीमत कई लोगों को पूरी जिंदगी चुकानी पड़ती है। उत्तराखंड के देहरादून में वर्ष 1997 में हुई एक ऐसी ही घटना का पटाक्षेप अब लगभग तीन दशक बाद देश की सर्वोच्च अदालत ने कर दिया है। महज 500 रुपये की एक घड़ी को लेकर शुरू हुआ विवाद एक व्यक्ति की मौत और तीन परिवारों के जीवन में बर्बादी का कारण बन गया।
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500 रुपये की घड़ी से शुरू हुआ विवाद
मामला देहरादून के एक मोहल्ले का है, जहां पद्म सिंह नामक व्यक्ति ने अपने पड़ोसी मनुआ को 500 रुपये में एक घड़ी बेची थी। कुछ दिनों बाद मनुआ को घड़ी पसंद नहीं आई और वह उसे वापस करना चाहता था। इसी बात को लेकर दोनों पड़ोसियों के बीच बहस शुरू हो गई। शुरुआत में यह सामान्य कहासुनी थी, लेकिन देखते ही देखते मामला हिंसक झड़प में बदल गया। विवाद में मनुआ के साथ रामू और मथु भी शामिल हो गए और तीनों ने मिलकर पद्म सिंह पर हमला कर दिया।
पत्थर के वार से गई जान
घटना के दौरान मथु ने पद्म सिंह के सिर पर एक भारी पत्थर से वार किया। वार के बाद पद्म सिंह अपना संतुलन खो बैठे और पास की सूखी एवं पथरीली नहर में गिर पड़े। गंभीर रूप से घायल पद्म सिंह को अस्पताल पहुंचाया गया, लेकिन डॉक्टर उन्हें बचा नहीं सके। एक मामूली विवाद ने एक व्यक्ति की जान ले ली और कई परिवारों की जिंदगी बदल दी।
2002 में सुनाई गई पहली सजा
घटना के लगभग पांच साल बाद वर्ष 2002 में देहरादून की स्थानीय अदालत ने तीनों आरोपियों को गैर-इरादतन हत्या का दोषी ठहराते हुए पांच-पांच साल की कठोर कारावास की सजा सुनाई। इसके बाद मामला उच्च न्यायालय पहुंचा, जहां 2012 में उत्तराखंड हाईकोर्ट ने निचली अदालत के फैसले को बरकरार रखा।
सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मामला
हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती देते हुए मामला उसी वर्ष सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। वर्षों तक चली सुनवाई के बाद जस्टिस उज्ज्वल भुइयां और जस्टिस अरुण पल्ली की पीठ ने इस मामले में अंतिम फैसला सुनाया। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि घटना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण थी, लेकिन मामले के मानवीय पहलुओं को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
दो दोषियों की मौत, तीसरा हुआ बुजुर्ग
सुनवाई के दौरान अदालत के सामने यह तथ्य आया कि तीन आरोपियों में से दो की मृत्यु हो चुकी है। वहीं, घटना के समय 33 वर्ष का युवक रहा मथु अब 60 वर्ष से अधिक आयु का बुजुर्ग बन चुका है। अदालत ने यह भी माना कि पद्म सिंह के सिर में गंभीर चोटें सूखी और पथरीली नहर में गिरने के कारण अधिक बढ़ गई थीं। इसके अलावा मथु पहले ही करीब डेढ़ वर्ष जेल में बिता चुका था।
सजा बरकरार, लेकिन अवधि घटाई
इन परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मथु की दोषसिद्धि को बरकरार रखा, लेकिन पांच साल की सजा को घटाकर पहले से काटी गई लगभग डेढ़ साल की अवधि तक सीमित कर दिया। इसके साथ ही करीब 29 वर्षों तक चली कानूनी लड़ाई का अंत हो गया और इस मामले का हमेशा के लिए पटाक्षेप हो गया।
एक पल का गुस्सा, जिंदगी भर का पछतावा
यह मामला इस बात का उदाहरण है कि क्षणिक गुस्सा और आवेश किस तरह जिंदगी भर के पछतावे में बदल सकता है। 500 रुपये की घड़ी को लेकर शुरू हुआ विवाद आखिरकार एक मौत, तीन परिवारों की बर्बादी और तीन दशक लंबी कानूनी लड़ाई का कारण बन गया।यह फैसला केवल एक कानूनी विवाद का अंत नहीं, बल्कि समाज के लिए एक बड़ा संदेश भी है कि छोटी-छोटी बातों को हिंसा में बदलने की कीमत कई पीढ़ियों को चुकानी पड़ सकती है।






