49 साल बाद खत्म हुआ कपूरथला राजघराने का संपत्ति विवाद! सुप्रीम कोर्ट बोला- ‘सिंहासन मिलेगा, पूरी संपत्ति नहीं’
49 साल पुराने शाही संपत्ति विवाद पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया। अदालत ने कहा कि पूर्व महाराजा की गद्दी सबसे बड़े उत्तराधिकारी को मिलेगी, लेकिन निजी संपत्ति सभी कानूनी वारिसों में बंटेगी। जानिए कपूरथला राजघराने से जुड़े इस ऐतिहासिक फैसले की पूरी कहानी।
- सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला: महाराजा का ताज मिलेगा, लेकिन शाही दौलत बंटेगी बराबर
- 49 साल पुराने शाही विवाद पर सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला
- सबसे बड़े बेटे को केवल सिंहासन, संपत्ति नहीं
- सुप्रीम कोर्ट ने बदल दिए राजघरानों के उत्तराधिकार के नियम
नई दिल्ली (Threesocieties.com Desk): देश के राजघरानों और शाही विरासत से जुड़े सबसे चर्चित मामलों में से एक पर सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए 49 साल पुराने विवाद पर आखिरकार विराम लगा दिया। सर्वोच्च अदालत ने साफ कर दिया कि पूर्व महाराजाओं की केवल ‘राजगद्दी’ या ‘सिंहासन’ ही ज्येष्ठाधिकार (Primogeniture) के नियम के तहत सबसे बड़े पुरुष उत्तराधिकारी को मिलेगा, लेकिन निजी शाही संपत्तियों पर केवल एक व्यक्ति का अधिकार नहीं होगा।
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सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस एसवीएन भट्टी की पीठ ने कहा कि पूर्व शासकों की निजी संपत्तियां सामान्य उत्तराधिकार कानूनों के अनुसार सभी वैधानिक वारिसों में बांटी जानी चाहिए। अदालत ने इस मामले में हाईकोर्ट के पुराने फैसले को भी रद्द कर दिया।
क्या था पूरा विवाद?
यह मामला कपूरथला राजघराने से जुड़ा था, जहां पूर्व महाराजा परमजीत सिंह के वंशजों के बीच दशकों से संपत्ति को लेकर कानूनी लड़ाई चल रही थी। विवाद इस बात को लेकर था कि क्या राजघराने की पूरी संपत्ति पर केवल सबसे बड़े बेटे का अधिकार होगा या फिर अन्य कानूनी वारिसों को भी हिस्सा मिलेगा। करीब पांच दशक तक अदालतों में चले इस मामले में अब सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम फैसला देते हुए स्पष्ट कर दिया कि ‘सिंहासन’ और ‘निजी संपत्ति’ दोनों अलग-अलग चीजें हैं।
सुप्रीम Court ने क्या कहा?
अदालत ने अपने फैसले में कहा— "केवल कथित सिंहासन ही उत्तराधिकार के नियम के अनुसार ट्रांसफर होता है। शासक की निजी संपत्तियां नहीं।" पीठ ने कहा कि सबसे बड़े पुरुष उत्तराधिकारी को केवल राजगद्दी का प्रतीकात्मक अधिकार मिल सकता है, लेकिन निजी संपत्तियों को हिंदू उत्तराधिकार कानून के अनुसार अन्य कानूनी वारिसों के साथ साझा करना होगा।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
इस फैसले को इसलिए बेहद अहम माना जा रहा है क्योंकि यह केवल एक राजघराने का मामला नहीं है, बल्कि देशभर के कई पूर्व शाही परिवारों के लिए भी मिसाल बन सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि विलय समझौते (Merger Agreement) के दौरान केवल सिंहासनारोहण से जुड़ी परंपराएं बची थीं, निजी संपत्तियों के लिए कोई विशेष संवैधानिक सुरक्षा नहीं दी गई थी।
विलय समझौते के बाद खत्म हुई संप्रभुता
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि भारतीय संघ में विलय के बाद पूर्व शासकों ने अपनी संप्रभुता छोड़ दी थी और वे सामान्य नागरिकों की तरह हो गए थे। अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा कि ऐसे शासकों के पास न तो कोई क्षेत्र बचा और न ही कोई प्रजा, इसलिए उन्हें केवल विशेषाधिकार प्राप्त नागरिक माना जा सकता है।
बड़ा संदेश क्या है?
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला स्पष्ट करता है कि आज के भारत में राजशाही की परंपराएं केवल प्रतीकात्मक रह गई हैं। सिंहासन और उपाधियां भले बनी रहें, लेकिन संपत्ति के मामले में सभी नागरिकों के लिए समान कानूनी नियम लागू होंगे। करीब 49 साल तक चले इस विवाद का अंत अब भारतीय न्यायिक इतिहास के एक महत्वपूर्ण अध्याय के रूप में देखा जा रहा है।






