ED की जांच में बड़ा खुलासा: बोकारो की 103 एकड़ वनभूमि पर फर्जीवाड़ा, 500 करोड़ की कमाई का खेल!
प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जांच में बोकारो की 103 एकड़ वनभूमि हड़पने की बड़ी साजिश का खुलासा हुआ है। फर्जी दस्तावेज, अवैध म्यूटेशन और अधिकारियों की मिलीभगत से 500 करोड़ रुपये की कमाई का आरोप सामने आया है
- बोकारो वनभूमि घोटाला: 1933 के फर्जी दस्तावेज से 500 करोड़ की जमीन हड़पने का खेल बेनकाब
- 1933 के कागज, 2026 में खुला राज:सरेंडर से पहले ही हो गई थी 103 एकड़ जमीन की नीलामी!
- फर्जी म्यूटेशन, अधिकारियों की मिलीभगत और 500 करोड़ की अवैध कमाई
रांची (Threesocieties.com Desk): प्रवर्तन निदेशालय (ED) की जांच में झारखंड के बोकारो जिले की 103 एकड़ वनभूमि हड़पने के लिए रची गयी एक बड़ी साजिश का पर्दाफाश हुआ है। जांच एजेंसी को इस जमीन की खरीद-बिक्री और फर्जी दस्तावेजों के जरिए करीब 500 करोड़ रुपये की अवैध कमाई के सबूत मिले हैं। ईडी की जांच में यह भी सामने आया है कि जमीन के सरेंडर होने से पहले ही उसकी नीलामी दिखा दी गयी थी, जबकि म्यूटेशन के लिए अधिकारियों को पैसे ट्रांसफर किये गये थे।
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2008 से शुरू हो गया था जमीन बेचने का खेल
ईडी की जांच में खुलासा हुआ है कि इजहार हुसैन ने वर्ष 2008 से ही बोकारो जिला के तेतुलिया मौजा स्थित इस जमीन की बिक्री शुरू कर दी थी। चौंकाने वाली बात यह है कि जमीन का म्यूटेशन चार साल बाद किया गया। यानी पहले जमीन बेची गयी और बाद में कागजी प्रक्रिया पूरी की गयी। जांच में यह भी सामने आया कि प्राथमिकी दर्ज होने के बाद भी जमीन की खरीद-बिक्री जारी रही। अधिकारियों की मिलीभगत से म्यूटेशन भी होते रहे। ईडी ने पाया कि प्राथमिकी के बाद कम से कम 20 लोगों को जमीन बेची गयी, जिनमें कुछ सरकारी अधिकारी भी शामिल हैं।
बेबी देवी ने स्वीकार किया 22.50 लाख देने की बात
जमीन खरीदने वालों में शामिल बेबी देवी ने पांच डिसमिल जमीन खरीदी थी। दस्तावेजों में इसकी कीमत मात्र 2.50 लाख रुपये दिखाई गयी, लेकिन ईडी की पूछताछ में उन्होंने 22.50 लाख रुपये भुगतान करने की बात स्वीकार की। इससे जमीन की वास्तविक कीमत छिपाकर बड़े पैमाने पर काले धन के इस्तेमाल की आशंका और मजबूत हो गयी है। वहीं इजहार हुसैन ने भी पूछताछ में स्वीकार किया कि वह वर्ष 2008 से इस जमीन की बिक्री कर रहा था।
सर्किल रेट से 11 गुना ज्यादा कीमत पर बेची गयी जमीन
ईडी ने जांच में पाया कि फर्जी दस्तावेजों के सहारे कब्जा जमाने के बाद जमीन को सर्किल रेट से लगभग 11 गुना अधिक कीमत पर बेचा गया। खरीद-बिक्री के आंकड़ों के विश्लेषण के बाद एजेंसी ने अनुमान लगाया कि इस पूरे खेल से 500 करोड़ रुपये से अधिक की अवैध कमाई की गयी।
1933 के फर्जी नीलामी दस्तावेज का इस्तेमाल
ईडी की जांच में सबसे बड़ा खुलासा वर्ष 1933 के कथित नीलामी दस्तावेज को लेकर हुआ। इजहार हुसैन और अन्य आरोपियों ने दावा किया था कि यह जमीन उन्हें पुरुलिया के रजिस्ट्री कार्यालय से हुई नीलामी के जरिए मिली थी। दस्तावेज में नीलामी की तारीख 20 अक्टूबर 1933 दर्शायी गयी थी, जबकि जिला कलेक्टर द्वारा इसे 23 अक्टूबर 1933 को जारी दिखाया गया। लेकिन जब ईडी ने पुरुलिया रजिस्ट्री कार्यालय में जांच की तो पता चला कि संबंधित जमीन 25 नवंबर 1933 को सरेंडर हुई थी। यानी जमीन के सरेंडर होने से पहले ही उसकी नीलामी दिखा दी गयी थी। ईडी के अनुसार यह स्पष्ट रूप से फर्जी दस्तावेज तैयार कर सुनियोजित तरीके से जमीन हड़पने की साजिश थी।
म्यूटेशन केस में भी बड़ा फर्जीवाड़ा
जांच में यह भी सामने आया कि जिस म्यूटेशन केस के आधार पर इजहार हुसैन और अन्य लोगों के नाम पर जमीन का नामांतरण किया गया, वह केस उन्होंने दायर ही नहीं किया था। ईडी के मुताबिक म्यूटेशन केस नंबर 1317(VII)/2012-13 मूल रूप से डिमपल देवी नामक महिला ने अपनी जमीन के लिए दायर किया था। बाद में उसमें छेड़छाड़ कर “हुसैन ब्रदर्स” का नाम जोड़ दिया गया। फॉरेंसिक जांच में भी इस जालसाजी की पुष्टि हुई है। मामले में तत्कालीन अंचल अधिकारी निर्मल टोप्पो को पहले ही बर्खास्त किया जा चुका है।
अंचल अधिकारी के खाते में पैसे ट्रांसफर के सबूत
ईडी को बैंक खातों की जांच के दौरान ऐसे सबूत मिले हैं जिनसे यह पुष्टि होती है कि म्यूटेशन प्रक्रिया के दौरान जमीन से जुड़े लोगों ने तत्कालीन अंचल अधिकारी के खाते में पैसे ट्रांसफर किये थे। इससे अधिकारियों की भूमिका भी संदेह के घेरे में आ गयी है।
वनभूमि थी विवादित जमीन
ईडी की जांच में यह भी साफ हुआ कि विवादित 103 एकड़ जमीन पहले से वनभूमि थी। बिहार सरकार ने 28 अप्रैल 1947 को अधिसूचना जारी कर इसे प्राइवेट फॉरेस्ट घोषित किया था। बाद में 24 मई 1958 को इसे प्रोटेक्टेड फॉरेस्ट घोषित कर दिया गया। जमीन के पुराने दस्तावेजों में वर्ष 1947 में जिन लोगों का नाम मालिक के रूप में दर्ज था, उनमें शालू महतो, साहेब राम, कांदू सिंह, भिखारी सिंह, दुखी सिंह, छोटू सिंह और राम सिंह शामिल थे। लेकिन समीर महतो उर्फ समरुद्दीन अंसारी का नाम कहीं दर्ज नहीं मिला।
कई बड़े नामों पर गिर सकती है गाज
ईडी की जांच के बाद अब इस मामले में कई अधिकारियों, जमीन कारोबारियों और खरीददारों की भूमिका जांच के दायरे में आ गयी है। एजेंसी आने वाले दिनों में और बड़ी कार्रवाई कर सकती है। झारखंड के चर्चित जमीन घोटालों में यह मामला अब सबसे बड़े मामलों में गिना जा रहा है।






