750 करोड़ शराब घोटाला: ACB की सुस्ती से सभी आरोपी बेल पर बाहर,एक साल, 17 गिरफ्तारी… लेकिन चार्जशीट नहीं
झारखंड के चर्चित शराब घोटाला मामले में ACB एक साल बाद भी चार्जशीट दाखिल नहीं कर सकी। निलंबित IAS विनय कुमार चौबे समेत सभी 17 आरोपी डिफॉल्ट बेल पर रिहा हो गए हैं। 750 करोड़ रुपये के इस कथित घोटाले में उत्पाद नीति, फर्जी बैंक गारंटी और शराब सिंडिकेट की भूमिका पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं।
- एक साल बाद भी ACB की जांच अधूरी
- सभी आरोपी डिफॉल्ट बेल पर बाहर
रांची (Threesocieties.com Desk): झारखंड के बहुचर्चित शराब घोटाला मामले में भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) की जांच पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। 20 मई 2025 को दर्ज इस मामले को एक साल पूरा होने वाला है, लेकिन अब तक एसीबी आरोपितों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल नहीं कर सकी। इसका सीधा फायदा यह हुआ कि निलंबित आईएएस अधिकारी विनय कुमार चौबे समेत सभी 17 आरोपी डिफॉल्ट बेल पर जेल से बाहर आ गए।
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यह मामला झारखंड की नई उत्पाद नीति, फर्जी बैंक गारंटी और शराब सिंडिकेट के जरिए सरकारी खजाने को कथित तौर पर भारी नुकसान पहुंचाने से जुड़ा है। शुरुआत में घोटाले की राशि 38 करोड़ रुपये बताई गई थी, लेकिन जांच के दौरान यह आंकड़ा बढ़कर करीब 750 करोड़ रुपये तक पहुंचने का दावा किया गया।
गिरफ्तारी में तेजी, चार्जशीट में सुस्ती
एसीबी ने 20 मई 2025 को प्राथमिकी दर्ज करते ही बड़ी कार्रवाई करते हुए निलंबित आईएएस विनय कुमार चौबे, उत्पाद विभाग के संयुक्त आयुक्त गजेंद्र सिंह और प्लेसमेंट एजेंसी मार्शन के स्थानीय प्रतिनिधि नीरज कुमार सिंह को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया था। इसके बाद क्रमवार 14 अन्य आरोपितों को भी गिरफ्तार किया गया।
गिरफ्तारी के समय एसीबी ने अदालत में दावा किया था कि आरोपितों के खिलाफ भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं के मजबूत साक्ष्य मौजूद हैं। इसी आधार पर अदालत ने सभी को न्यायिक हिरासत में भेजा था। लेकिन हैरानी की बात यह रही कि एसीबी तय समय सीमा के भीतर आरोप पत्र दाखिल नहीं कर सकी, जिसके चलते सभी आरोपितों को डिफॉल्ट बेल मिल गई। हालांकि, आईएएस विनय कुमार चौबे फिलहाल दूसरे मामले में जेल में बंद बताए जा रहे हैं।
क्या है पूरा शराब घोटाला?
एसीबी के अनुसार, वर्ष 2022 की नई उत्पाद नीति के तहत सरकारी शराब दुकानों में मैनपावर सप्लाई का ठेका फर्जी बैंक गारंटी के आधार पर कुछ चुनिंदा प्लेसमेंट एजेंसियों को दिया गया था। आरोप है कि अधिकारियों और शराब सिंडिकेट ने मिलकर नियमों को ताक पर रखते हुए इन एजेंसियों को फायदा पहुंचाया। जांच एजेंसी का दावा है कि झारखंड की नई उत्पाद नीति को छत्तीसगढ़ के शराब सिंडिकेट के साथ मिलकर तैयार किया गया, जिससे राज्य सरकार को भारी राजस्व नुकसान हुआ जबकि निजी कंपनियों को अनुचित लाभ पहुंचाया गया।
जांच पर उठ रहे सवाल
एक तरफ एसीबी लगातार बड़े भ्रष्टाचार मामलों में सख्त कार्रवाई का दावा करती रही, दूसरी तरफ इस मामले में एक साल बाद भी चार्जशीट दाखिल नहीं होना एजेंसी की कार्यशैली पर सवाल खड़े कर रहा है। विपक्षी दलों और कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय पर आरोप पत्र दाखिल हो जाता तो आरोपितों को डिफॉल्ट बेल का लाभ नहीं मिलता। सूत्रों के अनुसार, एसीबी के अधिकारियों का कहना है कि दस्तावेजों और वित्तीय लेन-देन की जांच पूरी नहीं हो पाने के कारण चार्जशीट तैयार नहीं हो सकी। हालांकि, इस दलील को लेकर भी कई सवाल उठ रहे हैं, क्योंकि गिरफ्तारी के वक्त एजेंसी ने “पुख्ता सबूत” होने का दावा किया था।






