वीडियो वायरल, शिकायत स्पष्ट… फिर FIR क्यों नहीं? धनबाद SSP हाईकोर्ट में हुए हाजिर, संज्ञेय अपराध में तुरंत दर्ज करें FIR

झारखंड हाईकोर्ट ने संज्ञेय अपराध में FIR दर्ज नहीं करने पर धनबाद SSP को सशरीर तलब किया। कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि cognizable offence के मामलों में तुरंत FIR दर्ज होनी चाहिए। SSP ने माफी मांगते हुए आज ही FIR दर्ज कराने का आश्वासन दिया।

वीडियो वायरल, शिकायत स्पष्ट… फिर FIR क्यों नहीं? धनबाद SSP हाईकोर्ट में हुए हाजिर, संज्ञेय अपराध में तुरंत दर्ज करें FIR
झारखंड हाईकोर्ट (फाइल फोटो)।

रांची (Threesocieties.com Desk): झारखंड हाईकोर्ट ने संज्ञेय अपराध (Cognizable Offence) के मामले में FIR दर्ज नहीं करने को गंभीर लापरवाही मानते हुए धनबाद के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) को सशरीर अदालत में उपस्थित होने का निर्देश दिया। मंगलवार को सुनवाई के दौरान धनबाद SSP कोर्ट में हाजिर हुए, जहां अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि जब शिकायत में संज्ञेय अपराध का स्पष्ट खुलासा हो, तो पुलिस को तत्काल FIR दर्ज करनी चाहिए।

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हाईकोर्ट की खंडपीठ ने इस मामले में पुलिस की कार्यशैली पर नाराजगी जताते हुए पूछा कि जब वीडियो वायरल होने और शिकायत के माध्यम से अपराध की जानकारी सामने आ चुकी थी, तो अब तक प्राथमिकी दर्ज क्यों नहीं की गई।
SSP ने कोर्ट से मांगी माफी
सुनवाई के दौरान धनबाद SSP ने अदालत से माफी मांगते हुए कहा कि पीड़िता की शिकायत के आधार पर आज ही FIR दर्ज कर दी जाएगी। उन्होंने यह भी कहा कि संबंधित ऑफिसर इंचार्ज (Officer In-Charge) के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जाएगी तथा उनके निलंबन की अनुशंसा भी की जाएगी। SSP के इस आश्वासन के बाद अदालत ने अगली सुनवाई 11 मई को निर्धारित की और निर्देश दिया कि तब तक FIR दर्ज कर उसकी जानकारी कोर्ट को दी जाए। साथ ही SSP को अगली तारीख पर फिर से सशरीर उपस्थित रहने को कहा गया है।
स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का निर्देश
हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और पुलिस प्रशासन को इस मामले में की गई कार्रवाई की विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने का भी आदेश दिया है। अदालत ने कहा कि संज्ञेय अपराध में FIR दर्ज करना पुलिस की कानूनी जिम्मेदारी है और इसमें किसी भी प्रकार की देरी न्याय व्यवस्था को प्रभावित करती है।
सोमवार को मांगा गया था स्पष्टीकरण
बताया जा रहा है कि सोमवार को ही अदालत ने धनबाद SSP से FIR दर्ज नहीं किए जाने को लेकर स्पष्टीकरण मांगा था। इसके बाद मंगलवार को उन्हें व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होना पड़ा। इस मामले की सुनवाई झारखंड हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति सुजीत नारायण और न्यायमूर्ति संजय प्रसाद की खंडपीठ ने की।
क्या है पूरा मामला?
दरअसल, इस मामले में अपीलकर्ता रवि साव को पहले ही जमानत मिल चुकी थी। इसके बाद पीड़िता ने उसकी जमानत रद्द करने की याचिका दायर की। पीड़िता का आरोप है कि जमानत पर रिहा होने के बाद रवि साव ने फिर से अवैध गतिविधियों को अंजाम दिया। पीड़िता ने इसकी शिकायत साइबर पुलिस स्टेशन में की थी, लेकिन FIR दर्ज नहीं की गई। अदालत के समक्ष यह तथ्य सामने आया कि शिकायत में संज्ञेय अपराध का स्पष्ट उल्लेख था, बावजूद इसके पुलिस ने मामला दर्ज नहीं किया। इसी पर अदालत ने कड़ी आपत्ति जताई और पूछा कि जब शिकायत में अपराध स्पष्ट है, तो FIR दर्ज करने में देरी क्यों हुई।
अधिवक्ता ने रखा पक्ष
अपीलकर्ता की ओर से अधिवक्ता शैलेश कुमार सिंह ने अदालत में पक्ष रखा। वहीं, अदालत ने पूरे मामले को गंभीर मानते हुए पुलिस प्रशासन को जवाबदेह ठहराया।
हाईकोर्ट का स्पष्ट संदेश
इस पूरे मामले ने यह साफ कर दिया है कि अब संज्ञेय अपराधों में FIR दर्ज करने में लापरवाही पुलिस अधिकारियों पर भारी पड़ सकती है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट संकेत दिया है कि कानून से ऊपर कोई नहीं है और शिकायत मिलने पर तुरंत कार्रवाई अनिवार्य है।
झारखंड में यह मामला पुलिस प्रशासन के लिए एक बड़ा संदेश माना जा रहा है कि FIR दर्ज करने में टालमटोल अब सीधे न्यायालय की सख्ती का कारण बन सकती है।