दहेज केस में झारखंड हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: घटना के बाद बने कानून से नहीं दी जा सकती सजा

झारखंड हाई कोर्ट ने दहेज मामले में निचली अदालत की सजा रद्द करते हुए कहा कि घटना के बाद लागू हुए कानून के तहत किसी आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता। अदालत ने संविधान के अनुच्छेद 20(1) का हवाला देते हुए अभियोजन के साक्ष्यों को भी अपर्याप्त माना।

दहेज केस में झारखंड हाई कोर्ट का बड़ा फैसला: घटना के बाद बने कानून से नहीं दी जा सकती सजा
झारखंड HC ने रद्द की दहेज मामले की सजा।

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       HighLights:

  • झारखंड हाई कोर्ट ने दहेज मामले में निचली अदालत की सजा रद्द की
  • कोर्ट ने कहा- घटना के बाद लागू कानून को पूर्वव्यापी प्रभाव से लागू नहीं किया जा सकता
  • संविधान के अनुच्छेद 20(1) का हवाला देते हुए आरोपी को राहत दी गई
  • अभियोजन पक्ष विवाह से पहले या विवाह के समय दहेज मांग साबित नहीं कर सका

रांची (Threesocieties.com Desk): झारखंड हाई कोर्ट ने दहेज निषेध अधिनियम से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी भी व्यक्ति को ऐसे कानून के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जो कथित घटना के बाद लागू हुआ हो। जस्टिस एके राय की अदालत ने कामाख्या नारायण तिवारी की अपील स्वीकार करते हुए निचली अदालत द्वारा सुनाई गई सजा को निरस्त कर दिया।

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हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 20(1) किसी भी व्यक्ति को उस कानून के तहत दंडित किए जाने से संरक्षण देता है, जो कथित अपराध के समय प्रभावी नहीं था। इसलिए घटना के दो वर्ष बाद लागू हुए संशोधित कानून के आधार पर दोषसिद्धि को बरकरार नहीं रखा जा सकता।

क्या था पूरा मामला?

मामला वर्ष 1979 में हुए विवाह और 1984 में कथित दहेज मांग से जुड़ा था। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि विवाह के बाद आरोपी और उसके परिजनों ने मोटरसाइकिल की मांग की तथा मांग पूरी नहीं होने पर विवाहिता शशि कुमारी को प्रताड़ित किया गया। बाद में उसकी मृत्यु हो गई। हत्या के आरोप में ट्रायल कोर्ट पहले ही आरोपी को बरी कर चुका था, लेकिन दहेज निषेध अधिनियम की धारा-4 के तहत छह माह के कारावास और ₹5,000 के जुर्माने की सजा सुनाई थी।

1986 का संशोधन नहीं हो सकता लागू

हाई कोर्ट ने कहा कि दहेज निषेध (संशोधन) अधिनियम, 1986 के जरिए धारा-4 का दायरा बढ़ाया गया था, जिसके तहत विवाह के बाद किसी भी समय की गई दहेज मांग को भी अपराध माना गया। यह संशोधन 19 नवंबर 1986 से प्रभावी हुआ था। अदालत ने स्पष्ट किया कि चूंकि कथित घटना वर्ष 1984 की है, इसलिए 1986 में लागू संशोधन को पीछे की तारीख से लागू नहीं किया जा सकता। ऐसा करना संविधान के अनुच्छेद 20(1) के विपरीत होगा।

गवाहों के बयान भी नहीं बने आधार

कोर्ट ने सभी गवाहों के बयानों का विस्तार से परीक्षण किया। अदालत ने पाया कि किसी भी गवाह ने यह नहीं कहा कि दहेज की मांग विवाह से पहले या विवाह के समय की गई थी। सभी गवाहों ने केवल विवाह के बाद मोटरसाइकिल मांगने की बात कही। उस समय लागू कानून के अनुसार धारा-4 के तहत अपराध तभी बनता था, जब दहेज की मांग विवाह से पहले, विवाह के समय या विवाह के संबंध में की गई हो। चूंकि अभियोजन इस आवश्यक तत्व को साबित नहीं कर सका, इसलिए आरोपी को दोषी ठहराने का कोई कानूनी आधार नहीं बचा।

संविधान के अनुच्छेद 20(1) का दिया हवाला

हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 20(1) यह सुनिश्चित करता है कि किसी भी नागरिक को ऐसे कानून के आधार पर सजा नहीं दी जा सकती, जो कथित अपराध के समय अस्तित्व में ही नहीं था। अदालत ने इसे आपराधिक न्याय व्यवस्था का मूल सिद्धांत बताते हुए कहा कि कानून का पूर्वव्यापी (Retrospective) उपयोग केवल तभी संभव है, जब वह आरोपी के पक्ष में हो या संविधान इसकी अनुमति देता हो।

महत्वपूर्ण कानूनी संदेश

इस फैसले को दहेज कानून और आपराधिक न्यायशास्त्र के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अदालत ने साफ किया कि अभियोजन को केवल आरोप लगाने से नहीं, बल्कि कानून के उस समय लागू प्रावधानों के अनुरूप सभी आवश्यक तथ्यों को साक्ष्यों के साथ सिद्ध करना होगा। यदि अपराध के समय लागू कानून के आवश्यक तत्व साबित नहीं होते, तो दोषसिद्धि टिक नहीं सकती। झारखंड हाई कोर्ट का यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल माना जा सकता है, जहां घटना के बाद लागू हुए संशोधित कानूनों के आधार पर दोषसिद्धि का प्रश्न उठता है।