9 साल जेल में, ट्रायल अधूरा... सुप्रीम कोर्ट बोला- 'न्यायिक अंतरात्मा झकझोर देने वाली देरी', हत्या के आरोपी को बेल
सुप्रीम कोर्ट ने 9 साल से अधिक समय से हत्या के मामले में जेल में बंद आरोपी को जमानत देते हुए कहा कि मुकदमे में असाधारण देरी संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत त्वरित सुनवाई और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का उल्लंघन है। अदालत ने कहा कि "जमानत नियम है, जेल अपवाद।"
HighLights:
- 9 साल 2 महीने से हत्या के मामले में जेल में बंद था आरोपी।
- सुप्रीम कोर्ट ने कहा- ट्रायल में असाधारण देरी न्यायिक अंतरात्मा को झकझोरने वाली।
- केवल 30 में से 12 गवाहों की ही हो सकी गवाही।
- अदालत ने कहा- त्वरित सुनवाई अनुच्छेद-21 के तहत मौलिक अधिकार।
- "जमानत नियम है और जेल अपवाद" सिद्धांत को दोहराया।
- ट्रायल कोर्ट जमानत की शर्तें तय करेगा।
नई दिल्ली (Threesocieties.com Desk): सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसले में स्पष्ट कर दिया कि किसी भी आरोपी को मुकदमे में अनावश्यक देरी के कारण वर्षों तक जेल में रखना संविधान के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है। सर्वोच्च अदालत ने हत्या के एक आरोपी को, जो पिछले 9 वर्ष 2 महीने से न्यायिक हिरासत में था, जमानत देते हुए कहा कि इस मामले में हुई देरी ने "हमारी न्यायिक अंतरात्मा को झकझोर दिया है।"
यह भी पढ़ें: 21 दिन के अनशन के बाद सोनम वांगचुक को पुलिस ने अस्पताल पहुंचाया, अनशन पर बैठे अभिजीत दीपके
जस्टिस एम. एम. सुंदरेश और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ ने संविधान के अनुच्छेद-32 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए आरोपी लियाकत अली को जमानत देने का आदेश दिया। उसके खिलाफ भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 302 (हत्या), 201 (सबूत मिटाना) और 34 (समान आशय) के तहत मामला दर्ज है।
अनुच्छेद-21 के अधिकार का उल्लंघन
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि किसी भी व्यक्ति को मुकदमे में प्रगति के बिना अनिश्चितकाल तक जेल में रखना उसके त्वरित सुनवाई (Speedy Trial) और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का सीधा उल्लंघन है। पीठ ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद-21 के तहत प्रत्येक नागरिक को शीघ्र न्याय पाने का अधिकार प्राप्त है। यदि कोई आरोपी लंबे समय तक हिरासत में है तो अदालतों और अभियोजन एजेंसियों का दायित्व और भी बढ़ जाता है कि मुकदमे का जल्द निपटारा कराया जाए।
"जमानत नियम है, जेल अपवाद"
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था के स्थापित सिद्धांत को दोहराते हुए कहा कि "Bail is the Rule, Jail is the Exception" यानी "जमानत नियम है और जेल अपवाद।" अदालत ने कहा कि हर आरोपी तब तक निर्दोष माना जाता है जब तक उसका अपराध अदालत में सिद्ध नहीं हो जाता। ऐसे में केवल मुकदमे में देरी के कारण किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता वर्षों तक छीनना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता।
30 में से केवल 12 गवाहों की हुई गवाही
रिकॉर्ड के अनुसार, आरोपी ने अदालत को बताया कि मुकदमे की धीमी रफ्तार के लिए वह किसी भी प्रकार से जिम्मेदार नहीं है। वर्ष 2024 में उसकी जमानत याचिका पर निर्णय आने के बाद भी ट्रायल में कोई विशेष प्रगति नहीं हुई। अब तक अभियोजन पक्ष के 30 गवाहों में से केवल 12 गवाहों की ही गवाही दर्ज हो सकी है। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि यदि इसी गति से मुकदमा चलता रहा तो इसके समाप्त होने में अभी कई वर्ष लग सकते हैं।
घटना के समय आरोपी था किशोरावस्था में
अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि कथित घटना के समय आरोपी किशोरावस्था में था। साथ ही उसके खिलाफ मामला प्रत्यक्ष साक्ष्यों के बजाय परिस्थितिजन्य साक्ष्यों (Circumstantial Evidence) पर आधारित है। पीठ ने कहा कि सामान्य परिस्थितियों में वह अनुच्छेद-32 के तहत इस प्रकार की याचिका पर विचार नहीं करती, लेकिन इस मामले में लंबी कैद और मुकदमे में असाधारण देरी ने हस्तक्षेप करना आवश्यक बना दिया।
ट्रायल कोर्ट तय करेगा जमानत की शर्तें
सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी को जमानत देने का आदेश तो दे दिया, लेकिन स्पष्ट किया कि जमानत की शर्तें संबंधित ट्रायल कोर्ट तय करेगा। साथ ही अदालत ने संकेत दिया कि न्यायिक व्यवस्था में लंबित मुकदमों और ट्रायल में देरी को गंभीरता से लेने की आवश्यकता है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला?
यह फैसला केवल एक आरोपी को मिली जमानत तक सीमित नहीं है, बल्कि देशभर की अदालतों में वर्षों से लंबित आपराधिक मुकदमों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश भी देता है। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि न्याय में देरी केवल प्रशासनिक समस्या नहीं, बल्कि नागरिकों के मौलिक अधिकारों से जुड़ा संवैधानिक प्रश्न है। अदालत का यह निर्णय भविष्य में ऐसे मामलों में एक महत्वपूर्ण न्यायिक मिसाल माना जा सकता है।




