पटना हाई कोर्ट का अनोखा फैसला: वीकेंड पापा के साथ, बाकी दिन मां के पास रहेगा 6 साल का बेटा
पटना हाई कोर्ट ने छह वर्षीय बच्चे की कस्टडी विवाद में साझा परवरिश का अनोखा अंतरिम आदेश दिया। बच्चा मां के साथ रहेगा, वीकेंड पिता के साथ बिताएगा, जबकि स्कूल और शिक्षा की जिम्मेदारी दोनों अभिभावक मिलकर निभाएंगे।
HighLights:
- पटना हाई कोर्ट ने छह वर्षीय बच्चे के लिए साझा परवरिश (Shared Parenting) की अंतरिम व्यवस्था बनाई
- बच्चा सप्ताह के दिनों में मां के साथ रहेगा, जबकि वीकेंड पिता के साथ बिताएगा
- पिता रोजाना बच्चे को स्कूल छोड़ने और वापस घर लाने की जिम्मेदारी निभाएंगे
- शिक्षा का पूरा खर्च दोनों अभिभावक बराबर-बराबर उठाएंगे
पटना (Threesocieties.com Desk): पति-पत्नी के बीच बढ़ते विवाद और कस्टडी की लड़ाई के बीच पटना हाई कोर्ट ने एक ऐसा मानवीय और संतुलित फैसला दिया है, जिसकी कानूनी और सामाजिक दोनों स्तरों पर चर्चा हो रही है। अदालत ने स्पष्ट किया कि माता-पिता के मतभेदों का सबसे अधिक असर बच्चों पर पड़ता है, इसलिए किसी भी निर्णय में बच्चे के सर्वोत्तम हित (Best Interest of Child) को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
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इसी सोच के साथ हाई कोर्ट ने छह वर्षीय बच्चे के लिए एक अंतरिम साझा परवरिश (Shared Parenting) की व्यवस्था लागू की है, ताकि वह मां और पिता दोनों का प्यार और स्नेह प्राप्त कर सके।
क्या था पूरा मामला?
मामला उस समय अदालत पहुंचा जब मां ने अपने छह वर्षीय बेटे की बरामदगी को लेकर बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका दायर की। उनका आरोप था कि बच्चे को उनकी अभिरक्षा से ले जाया गया है। दूसरी ओर पिता का कहना था कि बच्चा अपनी इच्छा से उनके पास आया था। दोनों पक्षों के दावों को सुनने के बाद अदालत ने जल्दबाजी में कोई निष्कर्ष निकालने के बजाय बच्चे के भविष्य और मानसिक विकास को प्राथमिकता दी।
चैंबर में हुई सुनवाई, पूरे परिवार से की बातचीत
न्यायमूर्ति राजीव रंजन प्रसाद और आलोक कुमार सिन्हा की खंडपीठ ने मामले की सुनवाई खुले कोर्ट रूम की बजाय चैंबर में की। इस दौरान केवल माता-पिता ही नहीं, बल्कि दोनों परिवारों के सदस्यों और बच्चों से भी विस्तार से बातचीत की गई। सुनवाई के दौरान अदालत ने महसूस किया कि पति-पत्नी के विवाद का सबसे बड़ा मानसिक बोझ बच्चों पर पड़ रहा है। इसी कारण अदालत ने दोनों पक्षों के बीच संवाद स्थापित कर साझा समाधान तैयार कराया।
क्या होगी बच्चे की नई दिनचर्या?
हाई कोर्ट की अंतरिम व्यवस्था के अनुसार—
छह वर्षीय बच्चा फिलहाल अपनी मां के साथ रहेगा।
पिता प्रतिदिन सुबह मां के घर से बच्चे को लेकर स्कूल जाएंगे।
स्कूल की छुट्टी के बाद पिता ही बच्चे को वापस मां के घर छोड़ेंगे।
प्रत्येक सप्ताहांत (वीकेंड) बच्चा पिता के साथ रहेगा।
गर्मी, सर्दी और अन्य लंबी छुट्टियां दोनों अभिभावकों के बीच बराबर-बराबर बांटी जाएंगी।
बच्चे की पढ़ाई और शिक्षा का पूरा खर्च दोनों माता-पिता संयुक्त रूप से वहन करेंगे।
बड़े बेटे की बात ने अदालत को किया भावुक
सुनवाई के दौरान दंपती के 12 वर्षीय बड़े बेटे से भी अदालत ने बातचीत की।बच्चे ने अदालत से कहा कि जब भी उसके पिता छुट्टियों में बुलाएंगे, वह उनके साथ जाएगा। उसने यह भी बताया कि उसकी मां ने कभी उसे पिता से मिलने से नहीं रोका। अदालत ने इस भावनात्मक बयान को अपने आदेश का हिस्सा बनाया और माना कि बच्चों के हितों की रक्षा हर हाल में की जानी चाहिए।
दोनों डॉक्टर, बच्चों की परवरिश में सक्षम
सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि माता और पिता दोनों ही पेशे से चिकित्सक हैं तथा बच्चों की देखभाल करने में पूरी तरह सक्षम हैं। इसलिए अदालत ने किसी एक पक्ष को पूर्ण अभिरक्षा देने के बजाय साझा जिम्मेदारी को बेहतर विकल्प माना।
फैमिली कोर्ट करेगा अंतिम फैसला
हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह केवल अंतरिम व्यवस्था है। बच्चे की स्थायी अभिरक्षा को लेकर अंतिम फैसला फैमिली कोर्ट में लंबित अभिभावकता वाद में होगा। खंडपीठ ने फैमिली कोर्ट को छह महीने के भीतर मामले का निपटारा करने का निर्देश दिया है। साथ ही दोनों पक्षों ने अदालत को आश्वस्त किया कि वे एक-दूसरे के खिलाफ कोई नया आपराधिक मामला दर्ज नहीं कराएंगे और अदालत द्वारा तय व्यवस्था का पूरी तरह पालन करेंगे।
इस फैसले को पारिवारिक विवादों में बच्चों के हित को सर्वोपरि रखने वाली एक महत्वपूर्ण और संवेदनशील न्यायिक पहल माना जा रहा है। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे मामलों में साझा परवरिश की व्यवस्था बच्चों के मानसिक और भावनात्मक विकास के लिए सकारात्मक साबित हो सकती है।




