रांची के योगदा सत्संग आश्रम पहुंचे CM हेमंत सोरेन और कल्पना, जानें क्यों खास है यह धाम ?

सीएम हेमंत सोरेन और कल्पना सोरेन ने रांची के चुटिया स्थित योगदा सत्संग आश्रम का दौरा किया। जानें परमहंस योगानंदजी से जुड़े इस ऐतिहासिक आश्रम की खासियत और 1918 से जुड़ी इसकी विरासत।

रांची के योगदा सत्संग आश्रम पहुंचे CM हेमंत सोरेन और कल्पना, जानें क्यों खास है यह धाम ?
हेमंत-कल्पना ने योगदा आश्रम में टेका माथा।

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   HighLights:

  • मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और विधायक कल्पना सोरेन ने चुटिया स्थित योगदा सत्संग आश्रम का दौरा किया
  • दोनों ने स्वामी ईश्वरानंदजी और स्वामी निर्मलानंदजी से मुलाकात की
  • मुख्यमंत्री ने परमहंस योगानंदजी के कक्ष, फोटो और पुस्तक गैलरी का अवलोकन किया
  • रांची का यह आश्रम परमहंस योगानंद की आध्यात्मिक और शैक्षणिक विरासत से गहराई से जुड़ा है

रांची (Threesocieties.com Desk):  मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और विधायक कल्पना सोरेन ने रांची के चुटिया स्थित ऐतिहासिक योगदा सत्संग आश्रम का दौरा किया। 2 अक्टूबर को हुए इस दौरे के दौरान मुख्यमंत्री और कल्पना सोरेन ने आश्रम के वरिष्ठ संतों स्वामी ईश्वरानंदजी और स्वामी निर्मलानंदजी से मुलाकात की। मुख्यमंत्री ने आश्रम की आध्यात्मिक गतिविधियों और परमहंस योगानंदजी से जुड़ी ऐतिहासिक धरोहरों के बारे में जानकारी ली। इस दौरान उन्होंने परमहंस योगानंदजी के कक्ष, फोटो गैलरी और पुस्तक गैलरी का भी अवलोकन किया।

योगदा सत्संग आश्रम का यह दौरा इसलिए भी खास है क्योंकि रांची का यह परिसर महान आध्यात्मिक गुरु परमहंस योगानंदजी के जीवन और उनके क्रियायोग मिशन से सीधे जुड़ा हुआ है। योगदा सत्संग सोसाइटी के अनुसार, 1918 में योगानंदजी ने रांची में आश्रम और बच्चों के लिए एक आदर्श-जीवन विद्यालय की स्थापना कर अपने जीवन के महत्वपूर्ण आध्यात्मिक कार्यों को आगे बढ़ाया था।

संतों से मिले हेमंत सोरेन, आश्रम की गतिविधियों की ली जानकारी

आश्रम पहुंचने पर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और कल्पना सोरेन ने स्वामी ईश्वरानंदजी तथा स्वामी निर्मलानंदजी से मुलाकात की। बातचीत के दौरान आश्रम की आध्यात्मिक गतिविधियों और उससे जुड़ी परंपराओं के बारे में जानकारी ली गई। मुख्यमंत्री ने आश्रम परिसर में मौजूद उन स्थलों का भी अवलोकन किया, जो परमहंस योगानंदजी की स्मृतियों से जुड़े हुए हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार, दौरे में योगानंदजी का कक्ष तथा फोटो और पुस्तक गैलरी प्रमुख आकर्षण रहे।

आखिर क्यों खास है रांची का योगदा सत्संग आश्रम?

रांची का योगदा सत्संग आश्रम सिर्फ एक धार्मिक या आध्यात्मिक परिसर नहीं है। यह परमहंस योगानंदजी के जीवन, क्रियायोग की शिक्षा और उनके शिक्षा संबंधी प्रयोगों की महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कड़ी है। योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ इंडिया के अनुसार, 1918 में रांची में योगानंदजी ने आश्रम और बालकों के लिए आदर्श-जीवन विद्यालय की स्थापना की थी। यहीं से उनके जीवन कार्य का एक महत्वपूर्ण अध्याय आगे बढ़ा।

1917 में हुई थी योगदा सत्संग की शुरुआत

परमहंस योगानंदजी ने वर्ष 1917 में योगदा सत्संग सोसाइटी ऑफ इंडिया की स्थापना की थी। संस्था का उद्देश्य क्रियायोग और ध्यान की शिक्षाओं को लोगों तक पहुंचाना था। बाद में यही आध्यात्मिक आंदोलन भारत से बाहर भी व्यापक रूप से फैला।योगानंदजी को उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘योगी कथामृत’ (Autobiography of a Yogi) के लिए दुनिया भर में जाना जाता है। योगदा सत्संग सोसाइटी के अनुसार, उन्होंने क्रियायोग की शिक्षाओं को व्यापक स्तर पर उपलब्ध कराने के लिए अपना जीवन समर्पित किया।

1918 में रांची आया योगानंदजी का मिशन

योगदा सत्संग सोसाइटी के आधिकारिक विवरण के मुताबिक, योगानंदजी ने पहले 22 मार्च 1917 को पश्चिम बंगाल के दिहिका में योगदा सत्संग ब्रह्मचर्य विद्यालय की शुरुआत की थी। शुरुआत में इसमें सात लड़के थे। एक वर्ष बाद विद्यालय को रांची स्थानांतरित किया गया। महाराजा सर मनिंद्र चंद्र नंदी ने रांची में अपना ग्रीष्मकालीन महल और लगभग 25 एकड़ का परिसर विद्यालय के लिए उपलब्ध कराया था। इसके बाद रांची योगानंदजी के आध्यात्मिक और शैक्षणिक कार्य का प्रमुख केंद्र बन गया।

आज भी सुरक्षित है परमहंस योगानंदजी का कक्ष

योगदा आश्रम की सबसे महत्वपूर्ण धरोहरों में से एक परमहंस योगानंदजी का कक्ष है। योगदा सत्संग सोसाइटी के अनुसार, योगानंदजी वर्ष 1918 से 1920 के दौरान रांची में जिस कमरे में रहे थे, उसे आज भी तीर्थस्थल के रूप में सुरक्षित रखा गया है। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने अपने दौरे के दौरान इसी ऐतिहासिक कक्ष का अवलोकन किया। इसके अलावा उन्होंने योगानंदजी से जुड़ी फोटो और पुस्तक गैलरी भी देखी।

फोटो और पुस्तक गैलरी में योगानंदजी की विरासत

आश्रम की गैलरी में परमहंस योगानंदजी के जीवन और उनकी शिक्षाओं से संबंधित सामग्री मौजूद है। यहां आने वाले श्रद्धालुओं और आगंतुकों को योगानंदजी के जीवन, उनके आध्यात्मिक अभियान और क्रियायोग की परंपरा से परिचित होने का अवसर मिलता है।‘योगी कथामृत’ के लेखक के रूप में योगानंदजी की पहचान दुनिया भर में है। योगदा सत्संग सोसाइटी उन्हें आधुनिक समय की प्रमुख आध्यात्मिक विभूतियों में गिनती है।

ध्यान, साधना और शांत वातावरण के लिए भी प्रसिद्ध

योगदा सत्संग आश्रम आज भी आध्यात्मिक साधना और ध्यान का प्रमुख केंद्र है। आधिकारिक जानकारी के अनुसार यहां सामूहिक ध्यान, सत्संग, विशेष कार्यक्रम और साधना संगम जैसे आयोजन होते हैं। आश्रम परिसर अपने शांत वातावरण और हरे-भरे उद्यानों के लिए भी जाना जाता है। रांची आश्रम में समय-समय पर लंबे सामूहिक ध्यान और विशेष आध्यात्मिक कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते हैं। अक्टूबर 2026 के कार्यक्रमों में 25 अक्टूबर को मासिक दीर्घ ध्यान का कार्यक्रम निर्धारित है।

देश-दुनिया तक पहुंची योगानंदजी की शिक्षाएं

परमहंस योगानंदजी की आध्यात्मिक शिक्षाएं केवल रांची या भारत तक सीमित नहीं रहीं। योगदा सत्संग सोसाइटी के अनुसार, उन्होंने क्रियायोग की शिक्षाओं को भारत और दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में पहुंचाने का काम किया। 1920 में उन्होंने सेल्फ-रियलाइजेशन फेलोशिप की स्थापना भी की। आज योगदा सत्संग सोसाइटी के भारत में रांची समेत कई आश्रम हैं और देशभर में इसके केंद्र व मंडलियां संचालित होती हैं।

रांची के लिए आध्यात्मिक विरासत का महत्वपूर्ण केंद्र

रांची का योगदा सत्संग आश्रम शहर की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है। एक तरफ यहां परमहंस योगानंदजी के जीवन से जुड़ी स्मृतियां सुरक्षित हैं, तो दूसरी तरफ आज भी ध्यान, साधना और आध्यात्मिक गतिविधियों की परंपरा जारी है।यही वजह है कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और कल्पना सोरेन का इस ऐतिहासिक परिसर का दौरा केवल एक सामान्य भ्रमण नहीं, बल्कि रांची की उस विरासत की ओर भी ध्यान आकर्षित करता है, जिसका संबंध एक सदी से अधिक पुरानी आध्यात्मिक परंपरा से है।

आश्रम से जुड़ी जरूरी जानकारी

योगदा सत्संग शाखा मठ, रांची परमहंस योगानंद पथ, रांची-834001 में स्थित है। योगदा सत्संग सोसाइटी की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार, आश्रम परिसर में आगंतुकों के लिए सामान्य दर्शन का समय सुबह 9 बजे से शाम 4:30 बजे तक है।