25 साल बाद शेयर बाजार में सबसे लंबी गिरावट, 8 हफ्तों में ₹26 लाख करोड़ डूबे
भारतीय शेयर बाजार में 25 साल बाद सबसे लंबी गिरावट का दौर, सेंसेक्स-निफ्टी लगातार 8वें हफ्ते टूटे। 8 हफ्तों में ₹26 लाख करोड़ की निवेशक संपत्ति घटी।
HighLights:
- 25 साल बाद सेंसेक्स-निफ्टी की सबसे लंबी साप्ताहिक गिरावट
- लगातार 8वें हफ्ते लाल निशान में बंद हुआ बाजार
- आठ हफ्तों में करीब ₹26 लाख करोड़ की निवेशक संपत्ति घटी
- निफ्टी 8 हफ्तों में करीब 8.7%, सेंसेक्स 8.4% नीचे
नई दिल्ली (Threesocieties.com Desk) : भारतीय शेयर बाजार में गिरावट का सिलसिला लगातार आठवें हफ्ते भी जारी रहा। सेंसेक्स और निफ्टी ने आठ सप्ताह की लगातार साप्ताहिक गिरावट दर्ज की है। यह करीब 25 वर्षों में दोनों प्रमुख सूचकांकों की सबसे लंबी साप्ताहिक गिरावट है।
लगातार बिकवाली के बीच आठ हफ्तों में बाजार में निवेशकों की संपत्ति में करीब ₹26 लाख करोड़ की कमी आई है। इस दौरान निफ्टी करीब 8.7 प्रतिशत और सेंसेक्स लगभग 8.4 प्रतिशत नीचे आया। निफ्टी में करीब 2,149 अंकों और सेंसेक्स में लगभग 6,590 अंकों की गिरावट दर्ज हुई।
1 अक्टूबर को भी बाजार में बड़ी गिरावट
गुरुवार, 1 अक्टूबर को कारोबार के अंतिम दिन भी घरेलू बाजार में दबाव देखने को मिला। सेंसेक्स 570.59 अंक यानी 0.79 प्रतिशत गिरकर 71,909.70 पर बंद हुआ। वहीं निफ्टी 198.50 अंक यानी 0.88 प्रतिशत टूटकर 22,421.95 पर आ गया। इसके साथ ही दोनों सूचकांकों की लगातार आठवें सप्ताह की गिरावट पूरी हुई। इस सप्ताह निफ्टी में करीब 3.1 प्रतिशत और सेंसेक्स में करीब 2.7 प्रतिशत की गिरावट रही। सितंबर में भी दोनों प्रमुख सूचकांक लगभग 6 प्रतिशत टूटे थे। 2 अक्टूबर को गांधी जयंती के कारण घरेलू शेयर बाजार बंद है।
₹26 लाख करोड़ से ज्यादा घटा बाजार का मूल्य
आठ सप्ताह की लगातार गिरावट का सीधा असर निवेशकों की संपत्ति पर पड़ा है। बाजार में बिकवाली के चलते बीएसई पर सूचीबद्ध कंपनियों के कुल मार्केट कैप में करीब ₹26 लाख करोड़ की कमी आई है। यह गिरावट 2020 के कोविड-19 क्रैश और 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के दौर की कई लगातार गिरावटों से भी लंबी रही है। निफ्टी अब अपने जनवरी 2026 के रिकॉर्ड स्तर से करीब 15 प्रतिशत नीचे आ चुका है। हालांकि, 20 प्रतिशत की गिरावट के स्तर को आम तौर पर तकनीकी रूप से बेयर मार्केट की सीमा माना जाता है।
FII की लगातार बिकवाली से बढ़ा दबाव
भारतीय शेयर बाजार पर विदेशी निवेशकों की बिकवाली बड़ा दबाव बना रही है। 1 अक्टूबर को विदेशी संस्थागत निवेशकों (FII) ने ₹9,484.22 करोड़ की शुद्ध बिकवाली की। इसके मुकाबले घरेलू संस्थागत निवेशकों (DII) ने ₹10,041.84 करोड़ की शुद्ध खरीदारी की। पिछले चार कारोबारी सत्रों में विदेशी निवेशकों की कुल बिकवाली करीब ₹34,965 करोड़ पहुंच गई। सितंबर में भी विदेशी निवेशकों का रुख भारतीय शेयर बाजार के खिलाफ रहा। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक सितंबर में FII ने भारतीय इक्विटी में करीब ₹44,013 करोड़ की शुद्ध बिकवाली की और 21 कारोबारी सत्रों में 16 दिन वे नेट सेलर रहे।
अमेरिकी बॉन्ड यील्ड बनी बड़ी चिंता
बाजार में दबाव की एक बड़ी वजह वैश्विक बॉन्ड यील्ड में तेजी है। अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में बढ़ोतरी से निवेशकों के लिए बॉन्ड जैसे अपेक्षाकृत कम जोखिम वाले विकल्प अधिक आकर्षक हो सकते हैं। इससे उभरते बाजारों, जिसमें भारत भी शामिल है, से विदेशी पूंजी के बाहर निकलने का दबाव बढ़ सकता है। बॉन्ड यील्ड और बॉन्ड की कीमत सामान्यतः विपरीत दिशा में चलती हैं। यील्ड बढ़ने पर मौजूदा बॉन्ड की कीमतों पर दबाव आता है। साथ ही ऊंची यील्ड वैश्विक निवेशकों के पोर्टफोलियो में इक्विटी और डेट के बीच आकर्षण को प्रभावित कर सकती है।
कच्चे तेल की कीमत भी बाजार के लिए चुनौती
कच्चे तेल की कीमतों में तेजी भारतीय बाजार के लिए दूसरी बड़ी चिंता है। भारत अपनी तेल जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में क्रूड महंगा होने पर आयात बिल, महंगाई और चालू खाते पर दबाव बढ़ सकता है। हाल की बाजार रिपोर्टों में ब्रेंट क्रूड की कीमत करीब 100 डॉलर प्रति बैरल के आसपास रहने और पश्चिम एशिया के भू-राजनीतिक तनाव को बाजार के लिए महत्वपूर्ण जोखिम बताया गया है।
कमजोर रुपये ने भी बढ़ाई चिंता
डॉलर के मुकाबले रुपये में कमजोरी ने भी विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय परिसंपत्तियों के डॉलर रिटर्न पर दबाव बढ़ाया है। बाजार में एक साथ विदेशी बिकवाली, ऊंची वैश्विक बॉन्ड यील्ड, महंगा कच्चा तेल और रुपये की कमजोरी का असर दिखाई दे रहा है।
अब बाजार की नजर इन संकेतों पर
आने वाले कारोबारी सत्रों में निवेशकों की नजर मुख्य रूप से चार बड़े संकेतों पर रहेगी—
पहला, विदेशी निवेशकों की बिकवाली की रफ्तार कम होती है या नहीं।
दूसरा, अमेरिकी और घरेलू बॉन्ड यील्ड किस दिशा में जाती है।
तीसरा, कच्चे तेल की कीमत 100 डॉलर के आसपास टिकती है या इसमें राहत मिलती है।
चौथा, रुपये की चाल और वैश्विक भू-राजनीतिक परिस्थितियां कैसी रहती हैं।
घरेलू संस्थागत निवेशकों की खरीदारी फिलहाल विदेशी बिकवाली के प्रभाव को कुछ हद तक कम कर रही है। हालांकि, लगातार आठ सप्ताह की गिरावट ने बाजार में वैश्विक संकेतों और विदेशी पूंजी प्रवाह की अहमियत को फिर सामने ला दिया है।
नोट: शेयर बाजार में निवेश बाजार जोखिमों के अधीन है। ऊपर दिए गए आंकड़े संबंधित कारोबारी सत्रों और उपलब्ध बाजार रिपोर्टों पर आधारित हैं।




