दो साल पुराना बिजली बकाया नहीं ऐसे वसूल पाएगी कंपनी, सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
बिजली के पुराने बकाए की वसूली पर सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला दिया है। जानें 2 साल बाद बिजली बिल के बकाए की वसूली को लेकर कोर्ट ने क्या नियम तय किए।
HighLights:
- बिजली के पुराने बकाए की वसूली पर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया
- सामान्यतः बिजली खपत से जुड़ा बकाया दो साल के भीतर वसूला जाना चाहिए
- दो साल बाद वसूली के लिए बकाया रकम का लगातार बिलों में दिखना जरूरी है
- केवल वर्षों बाद एकमुश्त सप्लीमेंट्री डिमांड जारी करना पर्याप्त नहीं है
नई दिल्ली (Threesocieties.com Desk): बिजली बिल के पुराने बकाए की वसूली को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सामान्य तौर पर बिजली की खपत से जुड़ी किसी रकम का बकाया दो साल के भीतर वसूला जाना चाहिए। हालांकि, दो साल की अवधि बीत जाने के बाद भी कुछ परिस्थितियों में बकाया वसूला जा सकता है। इसके लिए जरूरी है कि संबंधित रकम को लगातार बिजली के बिलों में बकाया के रूप में दर्शाया गया हो।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि सिर्फ कई साल बाद पुरानी रकम की एकमुश्त मांग खड़ी कर देना पर्याप्त नहीं है। बिजली कंपनी को यह दिखाना होगा कि संबंधित रकम कब देय हुई, उसका बिल कब जारी किया गया और उसके बाद आने वाले नियमित बिलों में उस बकाए को लगातार प्रदर्शित किया गया या नहीं।
दो साल बाद वसूली के लिए जरूरी है लगातार बकाया दिखाना
कोर्ट के मुताबिक, यदि बिजली कंपनी किसी उपभोक्ता से दो साल से अधिक पुरानी रकम की वसूली करना चाहती है, तो यह महत्वपूर्ण होगा कि वह रकम नियमित बिजली बिलों में लगातार बकाया के तौर पर दिखाई गई हो। यदि ऐसा नहीं किया गया और कई साल बाद अचानक पुरानी अवधि का बकाया निकालकर उपभोक्ता से भुगतान की मांग की गई, तो ऐसी वसूली पर रोक लग सकती है।इस फैसले से बिजली उपभोक्ताओं के लिए यह बात महत्वपूर्ण हो जाती है कि पुराने बकाए के मामलों में सिर्फ बिजली कंपनी की ओर से जारी की गई नई मांग को ही अंतिम आधार नहीं माना जाएगा। यह भी देखा जाएगा कि संबंधित बकाया पहले से बिलों में किस तरह दर्ज था।
धारा 56(2) पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बिजली अधिनियम की धारा 56(2) हर परिस्थिति में दो साल बाद किसी सप्लीमेंट्री डिमांड को पूरी तरह प्रतिबंधित नहीं करती। अर्थात दो साल की अवधि को लेकर नियम को हर मामले में एक समान तरीके से लागू नहीं किया जा सकता। मामले के तथ्यों और इस बात की जांच जरूरी होगी कि संबंधित बकाया पहले के बिजली बिलों में लगातार दिखाया गया था या नहीं। यह फैसला जस्टिस एसवीएन भट्टी और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड से जुड़े मामले में दिया। सुप्रीम कोर्ट ने बिजली कंपनी की अपील को खारिज कर दिया।
57.74 लाख रुपये के बकाए से जुड़ा था मामला
यह मामला करीब 57.74 लाख रुपये के न्यूनतम खपत गारंटी शुल्क की मांग से संबंधित था। बिजली कंपनी ने यह मांग फरवरी से सितंबर 1998 की अवधि के लिए की थी। खास बात यह थी कि संबंधित मांग 13 फरवरी 2007, यानी करीब नौ साल बाद की गई थी। मामले के अनुसार, उपभोक्ता ने 4000 केवीए बिजली लोड के लिए आवेदन किया था। हालांकि उस समय बिजली उपलब्धता की स्थिति को देखते हुए कंपनी ने केवल 2000 केवीए लोड स्वीकृत किया था। बाद में बिजली कंपनी ने उपभोक्ता को अतिरिक्त 2000 केवीए बिजली उपलब्ध होने की जानकारी देते हुए इसकी पेशकश की। लेकिन उपभोक्ता ने सितंबर 1998 में अतिरिक्त बिजली आपूर्ति लेने में रुचि नहीं दिखाई।इसके बावजूद कंपनी ने वर्ष 1998 की अवधि के लिए उपभोक्ता से 57.74 लाख रुपये का न्यूनतम खपत गारंटी शुल्क मांग लिया।
बिजली लोकपाल ने रद्द कर दी थी मांग
मामला बिजली लोकपाल के समक्ष पहुंचा तो लोकपाल ने कंपनी की मांग को रद्द कर दिया। लोकपाल ने पाया कि अतिरिक्त 2000 केवीए बिजली लोड के लिए उपभोक्ता की ओर से सहमति नहीं दी गई थी। इसके अलावा ऐसा कोई रिकॉर्ड भी सामने नहीं आया, जिससे यह साबित हो सके कि अतिरिक्त बिजली लोड वास्तव में उपभोक्ता को उपलब्ध कराया गया था। इसके बाद मामला इलाहाबाद हाई कोर्ट पहुंचा। हाई कोर्ट ने भी बिजली लोकपाल के फैसले को सही माना।
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप से किया इनकार
इसके बाद बिजली कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया और बिजली कंपनी की अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने पुराने बकाए की वसूली के संदर्भ में महत्वपूर्ण बात कही कि किसी उपभोक्ता से दो साल की अवधि के बाद बकाया रकम की वसूली तभी की जा सकती है, जब संबंधित रकम को लगातार बिजली के बकाए के रूप में बिलों में दर्शाया गया हो।
केवल यह कहना पर्याप्त नहीं कि रकम पहले से बकाया थी
फैसले का अहम पहलू यह है कि बिजली कंपनी केवल यह दावा करके पुरानी रकम की वसूली नहीं कर सकती कि वह राशि पहले से बकाया थी। कंपनी को अपने नियमित बिजली बिलों में उस रकम को लगातार बकाया के रूप में दिखाना होगा। यदि पुरानी रकम लंबे समय तक बिलों में दिखाई ही नहीं गई और बाद में अचानक एक बड़ी सप्लीमेंट्री डिमांड जारी कर दी गई, तो ऐसी मांग की वैधता पर सवाल उठ सकता है। इस फैसले से साफ है कि बिजली बकाया वसूली के मामलों में बकाया राशि की उम्र के साथ-साथ बिलिंग रिकॉर्ड और कंपनी की ओर से की गई लगातार मांग भी महत्वपूर्ण होगी।
नोट: फैसले का सटीक कानूनी प्रभाव मामले के तथ्यों और बिजली अधिनियम की लागू धाराओं पर निर्भर करेगा; इसे हर पुराने बिजली बिल पर स्वतः लागू होने वाला “दो साल बाद कोई वसूली नहीं” नियम नहीं माना जाना चाहिए।




