गया बोरवेल रेस्क्यू: 300 फीट गहरे बोरवेल में 8 घंटे तक मौत से जूझता रहा 4 साल का पीयूष, NDRF ने बचाई जान

Bihar Gaya Borewell Rescue: गया के फतेहपुर में 4 वर्षीय पीयूष 300 फीट गहरे बोरवेल में गिर गया। NDRF और SDRF ने 8 घंटे के रेस्क्यू ऑपरेशन के बाद उसे सुरक्षित निकाला। पैर में फ्रैक्चर के बावजूद बच्चा स्वस्थ होकर घर लौट आया।

गया बोरवेल रेस्क्यू: 300 फीट गहरे बोरवेल में 8 घंटे तक मौत से जूझता रहा 4 साल का पीयूष, NDRF ने बचाई जान
4 साल का पीयूष सुरक्षित घर पहुंचा,खिली परिवार की मुस्कान।

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      HighLights:

  • करीब 30-35 फीट की गहराई पर फंसे बच्चे को 8 घंटे के रेस्क्यू के बाद सुरक्षित निकाला गया
  • NDRF, SDRF और जिला प्रशासन के संयुक्त अभियान से बची मासूम की जान
  • दाहिने पैर में फ्रैक्चर, प्राथमिक इलाज के बाद पीयूष सुरक्षित घर लौटा
  • गांव में खुशी का माहौल, ग्रामीण मां के 'काले टीके' और दुआओं की भी कर रहे चर्चा

गया (Threesocieties.com Desk):  बिहार के गया जिले के फतेहपुर प्रखंड के रंगूनगर (रघुनाथ नगर) गांव में गुरुवार को हुई घटना ने पूरे राज्य की सांसें थाम दी थीं। खेलते-खेलते चार वर्षीय पीयूष कुमार करीब 300 फीट गहरे खुले बोरवेल में गिर गया और लगभग 30 से 35 फीट की गहराई पर फंस गया। सूचना मिलते ही जिला प्रशासन, SDRF और NDRF की टीम मौके पर पहुंची और करीब 8 घंटे तक चले चुनौतीपूर्ण रेस्क्यू ऑपरेशन के बाद बच्चे को सुरक्षित बाहर निकाल लिया।

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बचाव अभियान के दौरान पूरे गांव की निगाहें बोरवेल पर टिकी थीं। हर कोई पीयूष की सलामती की दुआ कर रहा था। आखिरकार देर रात करीब 1:50 बजे NDRF की टीम ने बच्चे को सुरक्षित बाहर निकालकर एंबुलेंस से अस्पताल भेजा।

रेस्क्यू के बाद पैर में फ्रैक्चर की पुष्टि

सुरक्षित निकाले जाने के बाद पीयूष को पहले सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, फतेहपुर में चिकित्सकीय निगरानी में रखा गया। जांच के दौरान उसकी मानसिक और शारीरिक स्थिति सामान्य पाई गई, लेकिन दाहिने पैर की हड्डी में फ्रैक्चर की पुष्टि हुई। इसके बाद उसे बेहतर इलाज के लिए गया के निजी अस्पताल भेजा गया, जहां हड्डी रोग विशेषज्ञ उपलब्ध नहीं होने पर मगध मेडिकल कॉलेज अस्पताल रेफर किया गया। डॉक्टरों ने पैर में कच्चा प्लास्टर किया, दवाएं दीं और प्राथमिक उपचार के बाद घर भेज दिया। चिकित्सकों ने 15 दिन बाद दोबारा जांच कराने की सलाह दी है।

घर लौटा पीयूष, आंगन में फिर गूंजी मुस्कान

शुक्रवार को जब पीयूष घर पहुंचा तो परिवार की आंखों में खुशी के आंसू थे। जिस घर में एक दिन पहले मातम जैसा माहौल था, वहां अब राहत और खुशी का माहौल है। पीयूष के चाचा चंद्रदेव मांझी ने बताया कि बच्चा सामान्य रूप से बातचीत कर रहा है, खाना-पीना भी ठीक से कर रहा है। फिलहाल केवल पैर की विशेष देखभाल की जरूरत है। मुंबई में मजदूरी करने वाले पीयूष के पिता दिनेश मांझी को जैसे ही बेटे के सुरक्षित होने की सूचना मिली, परिवार में राहत की लहर दौड़ गई।

ऑक्सीजन, कैमरा और मां की आवाज बनी सहारा

रेस्क्यू ऑपरेशन के दौरान प्रशासन ने तत्काल ऑक्सीजन की व्यवस्था की। पाइप के जरिए बोरवेल में ऑक्सीजन पहुंचाई गई। बच्चे तक पानी भी पहुंचाया गया। रेस्क्यू टीम ने कैमरे की मदद से लगातार बच्चे की स्थिति पर नजर रखी। सबसे भावुक पल तब आया जब पाइप के जरिए उसकी मां की आवाज बच्चे तक पहुंचाई गई, ताकि वह घबराए नहीं। साथ ही पोकलेन मशीन से समानांतर गड्ढा खोदकर विशेषज्ञों ने बेहद सावधानी से रेस्क्यू अभियान को अंजाम दिया।

'काले टीके' की भी हो रही चर्चा

पीयूष के सुरक्षित बचने के बाद गांव में एक और चर्चा जोरों पर है। ग्रामीण महिलाओं का कहना है कि घटना से कुछ घंटे पहले उसकी मां प्रमिला देवी ने बेटे की आंखों में काजल लगाने के बाद माथे पर काला टीका लगाया था। ग्रामीण इसे मां की ममता, दुआ और भगवान की कृपा से जोड़कर देख रहे हैं। हालांकि चिकित्सा विज्ञान काले टीके को सुरक्षा का प्रमाणित माध्यम नहीं मानता, लेकिन ग्रामीण समाज में इसे बच्चों की सलामती और शुभकामना का प्रतीक माना जाता है।

प्रशासन और NDRF की हो रही सराहना

रेस्क्यू ऑपरेशन में जिला प्रशासन, SDRF और NDRF की टीमों ने समन्वय के साथ काम किया। समय पर कार्रवाई और तकनीकी दक्षता के कारण एक बड़ा हादसा टल गया। स्थानीय लोगों ने बचाव दल की मेहनत और प्रशासन की तत्परता की खुलकर सराहना की। पूरे इलाके में पीयूष के नए जीवन को किसी चमत्कार से कम नहीं माना जा रहा।