Bihar: पटना में रिटायर्ड टीचर को 15 दिन डिजिटल अरेस्ट रखा, FD तोड़कर ठगे 30 लाख
पटना में डिजिटल अरेस्ट के नाम पर साइबर ठगी का मामला सामने आया है। CBI और दिल्ली पुलिस बनकर ठगों ने रिटायर्ड शिक्षक को 15 दिन डराया और FD तुड़वाकर 30 लाख रुपये ठग लिये। जानें पूरी घटना।
HighLights:
- पटना के दानापुर थाना क्षेत्र के सगुना मोड़ निवासी रिटायर्ड शिक्षक से 30 लाख रुपये की साइबर ठगी
- साइबर अपराधियों ने डिजिटल अरेस्ट का डर दिखाया,शिक्षक ने FD तुड़वा 30 लाख रुपये ट्रांसफर कर दिये
- दिल्ली पुलिस, सीबीआइ और न्यायालय से जुड़ा बताकर मनी लॉन्ड्रिंग में फंसाने की धमकी दी
- दिल्ली के चांदनी चौक स्थित बैंक खाते में 6.80 करोड़ रुपये आने का दावा किया गया
पटना (Threesocieties.com Desk): बिहार की राजधानी पटना में साइबर ठगी का सनसनीखेज मामला सामने आया है। दानापुर थाना क्षेत्र के सगुना मोड़ निवासी जवाहर नवोदय विद्यालय के एक सेवानिवृत्त शिक्षक को साइबर अपराधियों ने करीब 15 दिनों तक डिजिटल अरेस्ट का डर दिखाकर 30 लाख रुपये ठग लिये। आरोपितों ने खुद को दिल्ली पुलिस, सीबीआइ और न्यायालय से जुड़ा बताकर शिक्षक पर मनी लॉन्ड्रिंग में शामिल होने का आरोप लगाया। गिरफ्तारी, गैर-जमानती वारंट और गोपनीय जांच का भय दिखाकर उन्हें लगातार मानसिक दबाव में रखा गया।
साइबर अपराधियों ने दावा किया कि दिल्ली के चांदनी चौक स्थित एक बैंक शाखा में शिक्षक के नाम पर खाता है, जिसमें विदेश से मनी लॉन्ड्रिंग के 6.80 करोड़ रुपये आये हैं। ठगों ने कथित तौर पर फर्जी बैंक पासबुक, अदालत के आदेश और पुलिस वर्दी में वीडियो कॉल के जरिये शिक्षक का विश्वास जीतने की कोशिश की। गिरफ्तारी के डर से शिक्षक ने अपनी फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) तुड़वा दी और 30 लाख रुपये आरोपितों के बताये खाते में भेज दिये।
बाद में जब साइबर अपराधियों ने उनसे सोना गिरवी रखकर कर्ज लेने या उसे गलाकर प्रमाण भेजने को कहा, तो उन्हें संदेह हुआ। उन्होंने अपने भतीजे को पूरी घटना बतायी। भतीजे की मदद से ठगी का पता चलने के बाद पीड़ित ने पटना साइबर थाने में प्राथमिकी दर्ज करायी। पुलिस मामले की जांच कर रही है।
Digital Arrest Scam: ऐसे शुरू हुआ ठगी का खेल
पीड़ित शिक्षक जवाहर नवोदय विद्यालय से सेवानिवृत्त हैं। वर्तमान में वह उत्तर प्रदेश सरकार के अधीन संविदा पर कार्यरत हैं और मुरादाबाद स्थित अटल आवासीय विद्यालय में पढ़ाते हैं। शिक्षक के अनुसार, 20 सितंबर को उनके व्हाट्सएप पर एक महिला का फोन आया। महिला ने दावा किया कि उनके आधार कार्ड पर एक सिम कार्ड जारी किया गया है। उसने कथित तौर पर सिम का नंबर 6787413832 बताया और कहा कि इस मामले में उनके इस्तेमाल वाले मोबाइल नंबर को बंद किया जा सकता है।
शिक्षक ने जब इसकी वजह पूछी, तो महिला ने दिल्ली के बाराखंबा थाने में उनके खिलाफ शिकायत दर्ज होने की बात कही। उसने शिकायत संख्या भी बतायी। इसके बाद शिक्षक को कथित तौर पर दिल्ली पुलिस से जोड़ने की बात कही गयी। इसी के साथ ठगी के इस सुनियोजित खेल की शुरुआत हुई।
वीडियो कॉल पर पुलिस की वर्दी में आया व्यक्ति
महिला की बात के बाद शिक्षक की वीडियो कॉल पर एक ऐसे व्यक्ति से बातचीत करायी गयी, जिसने पुलिस की वर्दी पहन रखी थी। उसने शिक्षक से शिकायत संख्या पूछी और फिर कथित तौर पर उन्हें पुलिस मुख्यालय से संपर्क कराने की बात कही। इसके बाद शिक्षक को बताया गया कि उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी हो चुका है। आरोपितों ने दावा किया कि वारंट में उनका नाम, पता और आधार कार्ड से जुड़ी जानकारी दर्ज है।
पुलिस कार्रवाई और गिरफ्तारी की आशंका से शिक्षक घबरा गये। साइबर अपराधियों ने इसी डर का फायदा उठाया। उन्होंने शिक्षक को यह विश्वास दिलाने की कोशिश की कि मामला गंभीर है और जांच में सहयोग नहीं करने पर उन्हें तत्काल गिरफ्तार किया जा सकता है।
6.80 करोड़ रुपये की मनी लॉन्ड्रिंग में फंसाने की धमकी
साइबर अपराधियों ने शिक्षक पर दबाव बढ़ाने के लिए दिल्ली के चांदनी चौक स्थित एक बैंक शाखा की कथित पासबुक दिखाई। उसमें शिक्षक का फोटो, नाम और पता दर्ज होने का दावा किया गया। आरोपितों ने कहा कि उनके नाम पर बैंक खाता खोला गया है और उसमें विदेश से मनी लॉन्ड्रिंग के 6.80 करोड़ रुपये आये हैं। इस तरह शिक्षक को एक बड़े आर्थिक अपराध में फंसाने की धमकी दी गयी। इसके बाद उनकी बात एक कथित वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से करायी गयी। उस व्यक्ति ने खुद को जांच से जुड़ा अधिकारी बताते हुए शिक्षक से सीबीआइ के टीम लीडर प्रदीप कुमार सिंह के नाम पर आवेदन देने को कहा। आरोपितों ने इसे ऑनलाइन जांच की प्रक्रिया का हिस्सा बताया। शिक्षक के सामने ऐसी स्थिति तैयार की गयी, जिससे उन्हें लगने लगा कि वह किसी वास्तविक पुलिस और केंद्रीय जांच एजेंसी की कार्रवाई में फंस गये हैं।
फर्जी अदालत के आदेश और गिरफ्तारी की तस्वीरों से बढ़ाया डर
ठगों ने कथित तौर पर दिल्ली सेशन कोर्ट के नाम पर एक आदेश की प्रति भी दिखाई। उन्होंने दावा किया कि शिक्षक की जांच चल रही है और उन्हें अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए हर निर्देश का पालन करना होगा।आरोपितों ने कथित तौर पर कहा कि यदि शिक्षक निर्दोष पाये जाते हैं, तो एक महीने के भीतर अनापत्ति प्रमाणपत्र (NOC) जारी कर दिया जाएगा। वहीं, दोषी पाये जाने पर तत्काल गिरफ्तार कर जेल भेजने की धमकी दी गयी।
शिक्षक को यह भी बताया गया कि जांच की गोपनीयता भंग होने या उनके भाग जाने की स्थिति में उन्हें जिम्मेदार ठहराया जाएगा। गिरफ्तारी का डर और गहरा करने के लिए हथकड़ी पहने पांच लोगों की तस्वीर या दृश्य भी दिखाये गये।इस तरह आरोपितों ने कथित तौर पर पुलिस, सीबीआइ, बैंक और अदालत का नाम लेकर शिक्षक को यह विश्वास दिलाने की कोशिश की कि वह गंभीर कानूनी कार्रवाई के दायरे में हैं।
बैंक खातों और बैलेंस की जानकारी देकर जीता भरोसा
पीड़ित शिक्षक के मुताबिक, साइबर अपराधियों को उनके बैंक खातों, संबंधित शाखाओं और खाते में मौजूद बैलेंस की जानकारी थी। इस कारण उन्हें आरोपितों की बातों पर भरोसा होने लगा। ठगों ने कथित तौर पर भारतीय रिजर्व बैंक के एक प्रतिनिधि के दो दिनों तक मौजूद रहने की बात भी कही। उन्होंने जांच की प्रक्रिया को आधिकारिक दिखाने के लिए अलग-अलग दावे किये और शिक्षक से लगातार संपर्क बनाये रखा।
आरोपितों ने एक व्यक्ति सुदीप कुमार की गिरफ्तारी का भी जिक्र किया। दावा किया गया कि उसके पास से 180 पासबुक बरामद हुई हैं। इसी कथित मामले से शिक्षक को जोड़ते हुए आरोप लगाया गया कि उन्होंने बैंक खाते के बदले दो लाख रुपये और मनी लॉन्ड्रिंग की रकम का 10 प्रतिशत यानी 68 लाख रुपये कमीशन लिया है। इन आरोपों के जरिये शिक्षक को यह महसूस कराया गया कि मामला केवल एक सिम कार्ड या बैंक खाते का नहीं, बल्कि करोड़ों रुपये के कथित आर्थिक अपराध का है।
गिरफ्तारी के डर से तोड़ी FD, खाते में भेजे 30 लाख रुपये
लगातार फोन कॉल, कानूनी कार्रवाई की धमकी और गिरफ्तारी के भय से शिक्षक मानसिक दबाव में आ गये। आरोपितों के निर्देश पर वह मुरादाबाद से पटना आये। इसके बाद उन्होंने वरिष्ठ नागरिक के रूप में जमा अपनी फिक्स्ड डिपॉजिट (FD) तुड़वा दी। पीड़ित के अनुसार, उन्होंने 30 लाख रुपये आरोपितों द्वारा बताये गये बैंक खाते में भेज दिये।
ठगों ने कथित तौर पर उन्हें आइसीआइसीआइ बैंक के माध्यम से रकम भेजने को कहा। उनका दावा था कि मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़ी रकम इसी बैंक के खाते में आयी है, इसलिए जांच के लिए उसी माध्यम से पैसे भेजना जरूरी है।आरोपितों ने 24 घंटे के भीतर रकम वापस करने का भरोसा भी दिया। शिक्षक को उम्मीद थी कि जांच पूरी होने के बाद उनके पैसे लौट आयेंगे। इसी भरोसे और गिरफ्तारी के डर के बीच उन्होंने अपनी जीवनभर की बचत का बड़ा हिस्सा गंवा दिया।
सोना गिरवी रखने को कहा तो खुलने लगा ठगी का राज
30 लाख रुपये भेजने के करीब दो दिन बाद साइबर अपराधियों ने शिक्षक से एक और मांग कर दी। उन्होंने कथित तौर पर सोना बैंक में रखकर कर्ज लेने या सोने को गलाकर उसकी वास्तविकता से संबंधित प्रमाण भेजने को कहा। इस मांग ने शिक्षक के मन में संदेह पैदा कर दिया। उन्हें समझ में आने लगा कि जिस जांच और कानूनी कार्रवाई का हवाला देकर उनसे पैसे लिये गये, उसके पीछे कोई धोखाधड़ी हो सकती है। इसके बाद उन्होंने अपने भतीजे को पूरी घटना बतायी। भतीजा भारतीय स्टेट बैंक में कार्यरत हैं। उन्होंने मामले की जानकारी लेने के बाद साइबर ठगी की आशंका जतायी और शिक्षक को पुलिस में शिकायत करने की सलाह दी। तब पीड़ित को एहसास हुआ कि कथित पुलिस अधिकारियों, सीबीआइ जांच और अदालत के आदेश के नाम पर उन्हें लंबे समय तक डराकर रखा गया था।
पटना साइबर थाने में प्राथमिकी, पुलिस कर रही जांच
ठगी का पता चलने के बाद सेवानिवृत्त शिक्षक ने पटना साइबर थाने में प्राथमिकी दर्ज करायी है। शिकायत के अनुसार, साइबर अपराधियों ने करीब 15 दिनों तक डिजिटल अरेस्ट का डर दिखाकर उनसे 30 लाख रुपये की ठगी की। पुलिस मामले की जांच कर रही है। जांच में आरोपितों की पहचान, रकम जिन बैंक खातों में भेजी गयी उनकी जानकारी और ठगी में इस्तेमाल किये गये मोबाइल नंबरों की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है। हालांकि, आरोपितों की गिरफ्तारी और रकम की बरामदगी को लेकर फिलहाल कोई पुष्ट जानकारी उपलब्ध नहीं है।
Digital Arrest Scam से कैसे बचें?
इस घटना से स्पष्ट है कि साइबर अपराधी सरकारी एजेंसियों के नाम, फर्जी दस्तावेज और वीडियो कॉल का इस्तेमाल करके लोगों को डराने की कोशिश कर सकते हैं। ऐसे में कुछ सावधानियां बेहद जरूरी हैं।
डिजिटल अरेस्ट के नाम पर न घबराएं: पुलिस या जांच एजेंसी के नाम पर वीडियो कॉल करके किसी को लगातार निगरानी में रखने और डराकर पैसे वसूलने की मांग को गंभीरता से लें।
जांच के नाम पर पैसे न भेजें: किसी कथित अधिकारी के कहने पर सत्यापन, सुरक्षा जमा या बैंक खाते की जांच के नाम पर रकम ट्रांसफर न करें।
वारंट और दस्तावेजों की स्वतंत्र पुष्टि करें: वीडियो कॉल पर दिखाये गये पहचान पत्र, पासबुक या अदालत के आदेश को बिना सत्यापन के असली न मानें।
बैंक और निजी जानकारी साझा न करें: OTP, PIN, पासवर्ड और अन्य गोपनीय बैंकिंग जानकारी किसी अनजान व्यक्ति को न दें।
परिवार के लोगों से सलाह लें: गिरफ्तारी या गोपनीय जांच की धमकी मिलने पर अकेले निर्णय लेने के बजाय किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात करें।
तुरंत शिकायत करें: साइबर ठगी होने पर जल्द से जल्द 1930 हेल्पलाइन या आधिकारिक राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल cybercrime.gov.in के माध्यम से शिकायत दर्ज करायें। बैंक को भी तत्काल सूचना दें।
याद रखें: केवल फोन या वीडियो कॉल पर खुद को पुलिस, सीबीआइ या अदालत का अधिकारी बताने वाला व्यक्ति वास्तविक अधिकारी साबित नहीं हो जाता। डर के कारण जल्दबाजी में पैसे भेजने के बजाय संबंधित एजेंसी से स्वतंत्र रूप से पुष्टि करना जरूरी है।
Threesocieties News Desk 



