“पति-पत्नी में खटास तलाक का आधार नहीं! झारखंड हाई कोर्ट ने सुनाया बड़ा फैसला”
Jharkhand High Court ने कहा कि पति-पत्नी के बीच सामान्य खटास, मतभेद या वैवाहिक दूरी मात्र मानसिक क्रूरता नहीं। क्रूरता के ठोस सबूत जरूरी।
HighLights:
- सामान्य वैवाहिक खटास और स्वभावगत मतभेद को मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता
- तलाक के लिए क्रूरता के आरोप गंभीर, विशिष्ट और विश्वसनीय साक्ष्य से साबित करना जरूरी
- पति क्रूरता के आरोप साबित नहीं कर सका, झारखंड हाई कोर्ट ने तलाक की अपील खारिज की
- अलग रहना या वैवाहिक संबंधों में दूरी मात्र तलाक का पर्याप्त आधार नहीं
रांची (Threesocieties.com Desk): पति-पत्नी के बीच सामान्य खटास, स्वभावगत असहमति, अलग रहना या वैवाहिक संबंधों में दूरी मात्र को मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता। झारखंड हाई कोर्ट ने वैवाहिक विवाद से जुड़े एक मामले में यह महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए पति की तलाक संबंधी अपील खारिज कर दी।
हाई कोर्ट ने कहा कि तलाक के लिए लगाए गए क्रूरता के आरोपों को गंभीर, विशिष्ट और विश्वसनीय साक्ष्यों के जरिए साबित करना जरूरी है। केवल वैवाहिक जीवन में तनाव, छोटी-मोटी अनबन या पति-पत्नी के बीच मतभेद को अपने आप मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता। अदालत ने मामले में रांची फैमिली कोर्ट के 20 मार्च 2023 के फैसले को बरकरार रखा। फैमिली कोर्ट ने पति की तलाक याचिका खारिज कर दी थी। हाई कोर्ट ने भी माना कि पति क्रूरता के अपने आरोपों को आवश्यक साक्ष्य के आधार पर साबित करने में सफल नहीं रहा।
क्या है पूरा मामला?
मामला पति डॉ. एम. कुमार और लोहरदगा के बीएस कॉलेज में सहायक प्रोफेसर उनकी पत्नी आर. कुमार (बदला हुआ नाम) से जुड़ा है। दोनों का विवाह 28 जुलाई 2011 को विशेष विवाह अधिनियम के तहत मैरिज ऑफिसर के समक्ष हुआ था। इसके बाद हिंदू रीति-रिवाज के अनुसार भी विवाह संपन्न हुआ। विवाह के समय पति रूस में एमडी (फिजिशियन) की पढ़ाई कर रहे थे, जबकि पत्नी लोहरदगा में सहायक प्रोफेसर के पद पर कार्यरत थीं। विवाह के कुछ समय बाद दोनों के बीच वैवाहिक विवाद उत्पन्न हुआ और मामला अंततः अदालत तक पहुंचा।
पति ने पत्नी पर लगाए मानसिक क्रूरता के आरोप
पति ने विशेष विवाह अधिनियम के तहत क्रूरता को आधार बनाते हुए फैमिली कोर्ट में तलाक की याचिका दायर की थी। उसका आरोप था कि पत्नी उसके वृद्ध और बीमार माता-पिता के साथ दुर्व्यवहार करती थी और गाली-गलौज कर मानसिक रूप से प्रताड़ित करती थी।पति ने यह भी दावा किया कि वर्ष 2012 के बाद दोनों के बीच कोई शारीरिक या वैवाहिक संबंध नहीं रहा। उसके अनुसार, पत्नी एक ही छत के नीचे रहने के बावजूद अलग खाना बनाती थी और उससे बातचीत नहीं करती थी। पति का कहना था कि इन परिस्थितियों के कारण उसे मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ा और उसकी पढ़ाई तथा करियर भी प्रभावित हुआ। इन्हीं परिस्थितियों को उसने वैवाहिक क्रूरता का आधार बताते हुए तलाक की मांग की थी।
पत्नी ने आरोपों से किया इनकार
पत्नी ने पति की ओर से लगाए गए आरोपों को गलत बताया। उसने अदालत के समक्ष कहा कि शादी के समय उसके पिता ने 10 लाख रुपये नकद दिए थे। इसके बावजूद पति और ससुराल पक्ष की ओर से उसकी पढ़ाई के नाम पर पैसे की मांग की जाती रही। पत्नी ने आरोप लगाया कि उसे मानसिक और शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया गया। उसका कहना था कि उसने पति की पढ़ाई के लिए खुद लोन लिया और ससुराल पक्ष की देखभाल भी की।
पत्नी ने प्रताड़ना के आरोपों को लेकर बरियातू थाने में भारतीय दंड संहिता की धारा 498ए के तहत मामला दर्ज कराने की बात भी अदालत के समक्ष रखी। उसने अदालत में यह भी कहा कि वह अब भी पति के साथ रहना चाहती है और विवाह विच्छेद नहीं चाहती।
हाई कोर्ट ने क्या कहा?
मामले की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने तलाक के लिए क्रूरता साबित करने की कानूनी आवश्यकता पर जोर दिया। अदालत ने कहा कि तलाक की मांग करने वाले पक्ष पर ही अपने आरोपों और तलाक के आधार को साबित करने का दायित्व होता है। अदालत के अनुसार, वैवाहिक जीवन में सामान्य परेशानियां, छोटी-मोटी खटास, स्वभावगत मतभेद या असंगति अपने आप में मानसिक क्रूरता नहीं बन जाती।क्रूरता की प्रकृति और गंभीरता ऐसी होनी चाहिए कि मामले की परिस्थितियों को देखते हुए पति-पत्नी का साथ रहना उचित रूप से असंभव हो जाए।
पति क्रूरता के आरोप साबित नहीं कर सका
हाई कोर्ट ने पाया कि इस मामले में पति अपने द्वारा लगाए गए क्रूरता के आरोपों को आवश्यक साक्ष्यों से साबित करने में विफल रहा। केवल यह दावा कि दोनों के बीच वैवाहिक संबंध नहीं थे या बातचीत कम थी, अपने आप में तलाक के लिए मानसिक क्रूरता का पर्याप्त प्रमाण नहीं माना गया। अदालत ने फैमिली कोर्ट के उस निष्कर्ष में हस्तक्षेप का आधार नहीं पाया, जिसमें पति की तलाक याचिका खारिज की गई थी। इस तरह झारखंड हाई कोर्ट ने पति की अपील खारिज करते हुए रांची फैमिली कोर्ट के 20 मार्च 2023 के आदेश को बरकरार रखा।
तलाक के मामलों में फैसले का क्या महत्व?
इस फैसले में हाई कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि हर वैवाहिक विवाद या पति-पत्नी के बीच तनाव को कानूनी रूप से मानसिक क्रूरता नहीं माना जा सकता। तलाक के लिए क्रूरता का आरोप लगाने वाले पक्ष को उसके समर्थन में विश्वसनीय और पर्याप्त साक्ष्य पेश करने होंगे।यानी पति-पत्नी के बीच सामान्य मतभेद, स्वभाव में अंतर, वैवाहिक जीवन में दूरी या छोटी-मोटी अनबन को देखते हुए ही तलाक का आदेश नहीं दिया जा सकता। अदालत मामले के तथ्यों, आरोपों की प्रकृति और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह तय करेगी कि कथित व्यवहार वास्तव में कानूनी अर्थ में क्रूरता की श्रेणी में आता है या नहीं।
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