Dhanbad: सुदामडीह माइंस हादसे के 50 साल: 43 खनिकों की शहादत, आज भी जिंदा है दर्द
सुदामडीह शाफ्ट माइंस हादसे की 50वीं बरसी पर 43 शहीद खनिकों को श्रद्धांजलि दी गई। 1976 के भयावह हादसे और प्रभावित परिवारों की दर्दनाक कहानी पढ़ें।
HighLights:
- 4 अक्टूबर 1976 को सुदामडीह शाफ्ट माइंस हादसे में 43 खनिकों की हुई थी मौत
- खदान में मीथेन गैस और कोल डस्ट के जमाव को हादसे की वजह बताया गया
- 50वीं बरसी पर बलिदान वेदी पर दी गई भावभीनी श्रद्धांजलि
- मृत खनिकों की स्मृति में कोल नीर प्रोजेक्ट शुरू करने की तैयारी
धनबाद (Threesocieties.com Desk): भारत के कोयला उद्योग के इतिहास में 4 अक्टूबर 1976 की तारीख आज भी एक दर्दनाक अध्याय के रूप में याद की जाती है। सुदामडीह शाफ्ट माइंस में हुए भयावह हादसे को 50 साल पूरे हो गए, लेकिन उस त्रासदी की टीस आज भी मृत खनिकों के परिवारों और स्थानीय लोगों के दिलों में जिंदा है। हादसे की 50वीं बरसी पर रविवार को बंद पड़ी ऐतिहासिक सुदामडीह शाफ्ट माइंस परिसर में शहीद खनिकों को श्रद्धांजलि दी गई।
खदान परिसर के समीप स्थित बलिदान वेदी को फूलों से सजाया गया था। यहां आयोजित सर्वधर्म प्रार्थना सभा में 43 मृत खनिकों को नम आंखों से श्रद्धांजलि अर्पित की गई। पांच दशक गुजर जाने के बावजूद कार्यक्रम स्थल का माहौल बेहद भावुक रहा। मृत खनिकों के परिजनों की आंखों में अपनों को खोने का दर्द साफ दिखाई दे रहा था।
पूर्वी झरिया क्षेत्र के महाप्रबंधक तूनेश्वर पासवान ने बलिदान वेदी पर पुष्पचक्र अर्पित कर अमर खनिकों को नमन किया। इसके बाद बीसीसीएल के वरिष्ठ अधिकारियों, श्रमिक संगठनों के प्रतिनिधियों और स्थानीय लोगों ने दो मिनट का मौन रखा तथा मोमबत्तियां जलाकर मृत खनिकों को याद किया।
महाप्रबंधक तूनेश्वर पासवान ने कहा कि सुदामडीह शाफ्ट माइंस का इतिहास और यहां शहीद हुए खनिकों का बलिदान आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा और सतर्कता का प्रतीक रहेगा। उन्होंने कहा कि मृत खनिकों की स्मृति को संजोए रखने के लिए जल्द ही यहां कोल नीर प्रोजेक्ट की शुरुआत की जाएगी।
खदान को आधुनिक तकनीक से पुनर्जीवित करने की मांग
कार्यक्रम के दौरान बीसीकेयू के संयुक्त महामंत्री निताई महतो ने सुदामडीह खदान से जुड़े पुराने वादों को याद किया। उन्होंने तत्कालीन बीसीसीएल अध्यक्ष द्वारा किए गए आश्वासन का उल्लेख करते हुए खदान को आधुनिक तकनीक के साथ पुनर्जीवित करने की मांग उठाई।श्रद्धांजलि कार्यक्रम में क्षेत्रीय प्रबंधक सुधांशु महाजन, एजीएम अभिषेक झा, पीओ अरुण कुमार, प्रबंधक पीके पटनायक, अभियंता ए चंद्रा सहित बीसीएल के अधिकारी मौजूद रहे। बीसीकेयू से निताई महतो, पार्षद बीरेंद्र कुमार, भामसं नेता अरिंजय श्रीवास्तव, सुभाष तिवारी, राजेंद्र सोनार, जमसं से रतनपाल सिंह, राजेश सिंह, बीरेंद्र रवानी, रामविनय सिंह, संजय सुपकार ने भी शहीद खनिकों को श्रद्धांजलि दी।
50 साल बाद भी परिवारों के जख्म हरे
सुदामडीह हादसे ने सिर्फ 43 परिवारों को नहीं उजाड़ा था, बल्कि कई बच्चों से उनके पिता का साया भी छीन लिया था। हादसे के वक्त कुछ बच्चे मां के गर्भ में थे, जबकि कई इतने छोटे थे कि उन्हें अपने पिता का चेहरा तक देखने का मौका नहीं मिला। डंपर ऑपरेटर सुदामा गड़ेरिया बताते हैं कि उनके पिता स्वर्गीय तीर्थराज गड़ेरिया सुदामडीह शाफ्ट माइंस में पीसरेट मजदूर थे। हादसे के समय वह अपनी मां के गर्भ में महज तीन महीने के थे।
उन्होंने बताया कि उन्होंने कभी अपने पिता का चेहरा नहीं देखा। पिता की पहचान उनके लिए मां की यादों, आंसुओं और संघर्षों के जरिए बनी। मां के मुंह से हादसे का जिक्र सुनते ही आज भी उस भयावह घटना की कल्पना से रूह कांप उठती है। इसी तरह नगीना हरिजन ने बताया कि हादसे में पिता स्वर्गीय रामधनी हरिजन की मौत के समय उनकी उम्र महज छह महीने थी। परिवार में मां और एक बड़ी बहन ही बची थीं। वहीं, हादसे में जान गंवाने वाले स्वर्गीय बरातू राम धोबी के पुत्र कीर्तन लाल धोबी उस समय केवल डेढ़ वर्ष के थे।
हादसे के बाद प्रभावित परिवारों की महिलाओं को बीसीसीएल में नियोजन मिला। इन माताओं ने वर्षों तक संघर्ष करते हुए अपने बच्चों का पालन-पोषण किया। बच्चों के बालिग होने के बाद उन्होंने अनुकंपा के आधार पर मिली नौकरी उन्हें सौंप दी। आज ये तीनों बेटे उसी संस्थान में कार्यरत हैं, जहां उनके पिता ने आखिरी सांस ली थी। उनके लिए बीसीसीएल की नौकरी सिर्फ रोजगार नहीं, बल्कि अपने पिता की अधूरी कहानी से जुड़ी एक भावनात्मक कड़ी भी है।
सुबह 8:40 बजे हुआ था भयानक धमाका
4 अक्टूबर 1976 की सुबह सुदामडीह शाफ्ट माइंस में पहली पाली का काम सामान्य रूप से शुरू हुआ था। सुबह करीब 8:40 बजे खदान के 15 नंबर सीम हॉरिजन में अचानक एक जोरदार धमाका हुआ। उपलब्ध जांच विवरण के अनुसार, हादसे से पहले लगातार चार दिनों का अवकाश था। इस दौरान खदान का वेंटिलेशन सिस्टम बंद था। यांत्रिक पंखों के बंद रहने के कारण भूमिगत हिस्से में ज्वलनशील मीथेन गैस और कोल डस्ट के जमा होने की स्थिति बनी। काम शुरू होने के बाद एक चिंगारी ने आग और विस्फोट का रूप ले लिया। देखते ही देखते खदान के भीतर जहरीला धुआं और कोयले की धूल फैल गई। अंदर मौजूद 43 श्रमिकों को संभलने का पर्याप्त अवसर नहीं मिला। बचाव दल जब खदान के भीतर पहुंचा तो वहां का दृश्य बेहद भयावह था। कई शव बुरी तरह जले और क्षत-विक्षत हालत में मिले। दूसरी ओर खदान के बाहर परिजनों की चीख-पुकार से पूरा चासनाला-सुदामडीह इलाका गम में डूब गया था।
पांच दशक बाद भी उठता है जवाबदेही का सवाल
सुदामडीह हादसा सिर्फ एक औद्योगिक दुर्घटना नहीं था, बल्कि इसने खदान सुरक्षा, वेंटिलेशन व्यवस्था और श्रमिकों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए थे। हादसे के बाद उच्चस्तरीय जांच भी हुई, लेकिन परिजनों और स्थानीय लोगों के बीच आज भी यह सवाल कायम है कि इतनी बड़ी त्रासदी के लिए जिम्मेदारी किसकी तय हुई और क्या मृत खनिकों को वास्तव में न्याय मिला। पांच दशक बाद भी सुदामडीह की बलिदान वेदी उन 43 जिंदगियों की गवाही देती है, जिन्होंने कोयला उद्योग के लिए अपनी जान गंवाई। हर साल यहां होने वाला श्रद्धांजलि कार्यक्रम सिर्फ एक औपचारिकता नहीं, बल्कि उन परिवारों के संघर्ष और खनिकों के बलिदान को याद करने का अवसर बन जाता है।
सुदामडीह की यह त्रासदी आने वाली पीढ़ियों को यह संदेश भी देती है कि खनन क्षेत्र में तकनीक के साथ-साथ सुरक्षा व्यवस्था, वेंटिलेशन और श्रमिकों की जिंदगी की प्राथमिकता सर्वोच्च होनी चाहिए।आज 50 साल बाद भी उन 43 खनिकों की यादें सुदामडीह की मिट्टी में मौजूद हैं। उनकी शहादत को याद करते हुए हर आंख यही सवाल करती है—इतने वर्षों के बाद भी क्या उस हादसे से मिले सबक को पूरी तरह भुलाया नहीं गया है?
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