झारखंड हाई कोर्ट का फैसला : स्पेशल ब्रांच के दारोगा सामान्य कैडर में नहीं होंगे शामिल

Jharkhand High Court ने स्पेशल ब्रांच के 174 दारोगाओं को सामान्य पुलिस कैडर में शामिल करने की मांग खारिज की। भर्ती विज्ञापन में क्लोज्ड कैडर की जानकारी नहीं देना प्रशासनिक चूक माना। अभ्यर्थियों को गृह विभाग में अभ्यावेदन देने की छूट मिली।

झारखंड हाई कोर्ट का फैसला : स्पेशल ब्रांच के दारोगा सामान्य कैडर में नहीं होंगे शामिल
174 दारोगाओं को हाई कोर्ट से बड़ा झटका।

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    HighLights:

  • झारखंड हाईकोर्ट ने स्पेशल ब्रांच के दारोगाओं को सामान्य पुलिस कैडर में शामिल करने की मांग खारिज की
  • भर्ती विज्ञापन में क्लोज्ड कैडर की जानकारी नहीं देने को प्रशासनिक चूक, दो रिट याचिकाओं का निष्पादन
  • गृह विभाग में अभ्यावेदन देने की मिली छूट, अभ्यर्थी चार सप्ताह के भीतर अभ्यावेदन दे सकेंगे
  • सक्षम प्राधिकार को अभ्यावेदन मिलने के 12 सप्ताह के भीतर कारणयुक्त आदेश पारित करना होगा
  • वर्ष 2009 के सरकारी संकल्प के तहत गठित स्पेशल ब्रांच का अलग कैडर बरकरार रहेगा

रांची (Threesocieties.com Desk): झारखंड हाईकोर्ट ने राज्य पुलिस की स्पेशल ब्रांच में नियुक्त दारोगाओं को सामान्य पुलिस कैडर में शामिल करने की मांग खारिज कर दी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) की ओर से जिला पुलिस और स्पेशल ब्रांच के लिए एक ही प्रतियोगी परीक्षा आयोजित किए जाने से दोनों का कैडर एक नहीं हो जाता। भर्ती विज्ञापन में त्रुटि के आधार पर स्पेशल ब्रांच के दारोगाओं को सामान्य पुलिस कैडर में शामिल करने का निर्देश भी नहीं दिया जा सकता।

हालांकि, हाईकोर्ट ने भर्ती विज्ञापन में स्पेशल ब्रांच के पदों को क्लोज्ड कैडर यानी बंद कैडर होने की स्पष्ट जानकारी नहीं देने को विभागीय चूक माना। न्यायमूर्ति दीपक रोशन की अदालत ने 174 अभ्यर्थियों से संबंधित दो रिट याचिकाओं का निष्पादन करते हुए उन्हें गृह विभाग के सक्षम प्राधिकार के समक्ष अभ्यावेदन देने की छूट दी है।

अदालत के निर्देश के अनुसार, अभ्यर्थी फैसले का आदेश अपलोड होने की तारीख से चार सप्ताह के भीतर अपना विस्तृत अभ्यावेदन दे सकते हैं। सक्षम प्राधिकार को अभ्यावेदन प्राप्त होने के 12 सप्ताह के भीतर नियमानुसार कारणयुक्त आदेश पारित करना होगा।

एक ही परीक्षा से भर्ती, लेकिन कैडर अलग-अलग

यह मामला झारखंड कर्मचारी चयन आयोग की ओर से आयोजित संयुक्त पुलिस अवर निरीक्षक प्रतियोगिता परीक्षा-2017 से जुड़ा है। आयोग ने विज्ञापन संख्या 05/2017 के माध्यम से जिला पुलिस और स्पेशल ब्रांच में दारोगा के पदों पर नियुक्ति के लिए आवेदन आमंत्रित किए थे। याचिकाकर्ताओं ने इस चयन प्रक्रिया में भाग लिया था। उन्होंने अपनी प्राथमिकता में स्पेशल ब्रांच को चुना और चयनित होने के बाद वर्ष 2018 में वहां दारोगा के पद पर नियुक्त हुए। बाद में अभ्यर्थियों ने स्पेशल ब्रांच के बंद कैडर में नियुक्ति को लेकर आपत्ति जताई। उनकी मांग थी कि उन्हें सामान्य पुलिस कैडर में शामिल करने पर विचार किया जाए। इस मांग के समर्थन में उन्होंने भर्ती विज्ञापन में कैडर से संबंधित शर्तों की स्पष्ट जानकारी नहीं होने का मुद्दा उठाया।

अदालत ने इस मामले में स्पष्ट किया कि भर्ती के लिए एक ही प्रतियोगी परीक्षा आयोजित होना और नियुक्त पद का कैडर निर्धारित होना दो अलग-अलग विषय हैं। संयुक्त परीक्षा के माध्यम से अलग-अलग कैडर में नियुक्तियां की जा सकती हैं। इसलिए केवल एक ही परीक्षा से चयनित होने के आधार पर स्पेशल ब्रांच और जिला पुलिस के कैडर को एक नहीं माना जा सकता।

भर्ती विज्ञापन में क्या थी गलती?

याचिकाकर्ताओं की ओर से अदालत को बताया गया कि भर्ती विज्ञापन में स्पेशल ब्रांच के पदों को क्लोज्ड कैडर का हिस्सा होने की स्पष्ट जानकारी नहीं दी गई थी। अभ्यर्थियों के अनुसार, नियुक्ति पत्र मिलने के बाद उन्हें इस प्रतिबंध की जानकारी हुई। उनका कहना था कि किसी पद का बंद कैडर में होना सेवा की कई महत्वपूर्ण संभावनाओं को प्रभावित कर सकता है। इसमें स्थानांतरण, पदोन्नति और भविष्य में दूसरे पुलिस कैडर में जाने की संभावनाएं शामिल हैं। यदि विज्ञापन में इस शर्त का स्पष्ट उल्लेख किया गया होता, तो अभ्यर्थी अपनी प्राथमिकता तय करते समय सभी पहलुओं पर विचार कर सकते थे।

अदालत ने भी माना कि भर्ती विज्ञापन में केवल जिला पुलिस और स्पेशल ब्रांच के पदों की संख्या अलग-अलग बता देना पर्याप्त नहीं था। अभ्यर्थियों को यह भी स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए था कि स्पेशल ब्रांच के पद एक अलग बंद कैडर के अंतर्गत आते हैं और इस व्यवस्था के सेवा संबंधी क्या परिणाम हो सकते हैं। हाईकोर्ट ने विज्ञापन में 'क्लोज्ड कैडर' का उल्लेख नहीं किए जाने को प्रशासनिक चूक माना। अदालत के अनुसार, भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता बनाए रखने के लिए पदों की पहचान के साथ उनसे जुड़ी महत्वपूर्ण सेवा शर्तों का स्पष्ट खुलासा जरूरी है।

वर्ष 2009 में बना था स्पेशल ब्रांच का अलग कैडर

राज्य सरकार की ओर से अदालत में दलील दी गई कि स्पेशल ब्रांच का अलग बंद कैडर वर्ष 2009 में ही गठित किया गया था। गृह विभाग ने तीन जून 2009 को संकल्प जारी कर स्पेशल ब्रांच के पुनर्गठन और उसके लिए अलग कैडर बनाने का निर्णय लिया था। इसके बाद 18 अक्टूबर 2010 को अधिसूचना जारी कर संबंधित प्रावधानों में संशोधन किया गया। सरकार के अनुसार, स्पेशल ब्रांच का अलग कैडर बनाने के पीछे विशेष प्रशासनिक और कार्यगत उद्देश्य था। इस शाखा में खुफिया जानकारी जुटाने और अन्य विशेष जिम्मेदारियों के निर्वहन के लिए प्रशिक्षित, योग्य तथा अनुभवी कर्मियों की निरंतर उपलब्धता सुनिश्चित करना जरूरी था।

राज्य सरकार ने यह भी दलील दी कि वर्ष 2016 और 2017 में भर्ती प्रक्रिया से संबंधित प्रावधानों में बदलाव किए जाने के बावजूद स्पेशल ब्रांच की अलग कैडर व्यवस्था समाप्त नहीं हुई। संयुक्त प्रतियोगी परीक्षा आयोजित होने से दोनों कैडर का विलय नहीं हो जाता।अदालत के समक्ष स्पेशल ब्रांच के अलग कैडर को समाप्त करने या उसे सामान्य पुलिस कैडर में मिलाने वाला कोई वैध आदेश प्रस्तुत नहीं किया गया। ऐसे में केवल भर्ती विज्ञापन में जानकारी छूट जाने के आधार पर पहले से लागू कैडर व्यवस्था को समाप्त नहीं किया जा सकता।

विज्ञापन की गलती से नहीं बदल सकती कैडर व्यवस्था

न्यायमूर्ति दीपक रोशन की अदालत ने अपने फैसले में भर्ती प्रक्रिया और कैडर की कानूनी पहचान के बीच अंतर स्पष्ट किया। अदालत ने कहा कि भर्ती विज्ञापन में किसी महत्वपूर्ण सेवा शर्त का उल्लेख नहीं होना गंभीर प्रशासनिक चूक हो सकती है, लेकिन इससे संबंधित पद की कानूनी स्थिति अपने आप नहीं बदल जाती।

अदालत के अनुसार, जब किसी पद के लिए अलग कैडर की व्यवस्था लागू है, तो केवल संयुक्त परीक्षा में शामिल होने या समान चयन प्रक्रिया के माध्यम से नियुक्त होने से उस पद को सामान्य कैडर का हिस्सा नहीं माना जा सकता। इसलिए भर्ती विज्ञापन में त्रुटि को आधार बनाकर स्पेशल ब्रांच के दारोगाओं को सामान्य पुलिस कैडर में शामिल करने का निर्देश नहीं दिया जा सकता। अदालत ने इस तरह कैडर के विलय की मांग को स्वीकार नहीं किया।

हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि भर्ती विज्ञापन में बंद कैडर की जानकारी नहीं दिए जाने से अभ्यर्थियों की शिकायत को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। भर्ती प्रक्रिया में अभ्यर्थियों को पद और उससे जुड़ी सेवा शर्तों की पूरी जानकारी मिलना जरूरी है।

174 अभ्यर्थियों को गृह विभाग में अभ्यावेदन देने की छूट

हाईकोर्ट ने 174 अभ्यर्थियों से संबंधित दोनों रिट याचिकाओं का निष्पादन करते हुए उन्हें गृह विभाग के सक्षम प्राधिकार के समक्ष अपना पक्ष रखने का अवसर दिया है। अदालत के निर्देश के अनुसार, अभ्यर्थी आदेश अपलोड होने की तारीख से चार सप्ताह के भीतर विस्तृत अभ्यावेदन प्रस्तुत कर सकते हैं। अभ्यावेदन प्राप्त होने के बाद सक्षम प्राधिकार को 12 सप्ताह के भीतर नियमानुसार कारणयुक्त आदेश पारित करना होगा। इसका अर्थ है कि अदालत ने अभ्यर्थियों को सीधे सामान्य पुलिस कैडर में शामिल करने का आदेश नहीं दिया है। उन्हें अपनी शिकायत और मांग संबंधित सक्षम प्राधिकार के समक्ष रखने की छूट दी गई है। इस पर आगे का निर्णय लागू नियमों और कैडर व्यवस्था के अनुरूप लिया जाना होगा।

भविष्य की भर्तियों में स्पष्ट जानकारी देने की जरूरत

इस फैसले में हाईकोर्ट ने भर्ती विज्ञापनों में पारदर्शिता के महत्व को भी रेखांकित किया। अदालत के अनुसार, यदि किसी पद पर नियुक्ति के साथ कैडर संबंधी विशेष प्रतिबंध जुड़े हैं और उनका असर स्थानांतरण, पदोन्नति या भविष्य की सेवा संभावनाओं पर पड़ सकता है, तो इन शर्तों का विज्ञापन में स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए। भर्ती एजेंसी को अभ्यर्थियों को यह बताना चाहिए कि संबंधित पद किस कैडर के अंतर्गत आता है और उसकी प्रमुख सेवा शर्तें क्या हैं। इससे अभ्यर्थियों को अपनी प्राथमिकताएं तय करने में मदद मिलेगी और नियुक्ति के बाद इस तरह के विवादों से बचा जा सकेगा।

कुल मिलाकर, झारखंड हाईकोर्ट ने स्पेशल ब्रांच के दारोगाओं को सामान्य पुलिस कैडर में शामिल करने की मांग स्वीकार नहीं की, लेकिन भर्ती विज्ञापन में क्लोज्ड कैडर की जानकारी नहीं देने को विभागीय चूक माना। अब संबंधित अभ्यर्थी निर्धारित समयसीमा के भीतर गृह विभाग के सक्षम प्राधिकार के समक्ष अपना पक्ष रख सकते हैं।