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Highlights:

  • 8 नवंबर को दीपावली: गृहस्थों, कारोबारियों और साधकों के लिए पूजा के अलग-अलग मुहूर्त और विधान
  • शाम का स्थिर लग्न: वृषभ लग्न में शाम 5:38 से 7:34 बजे तक लक्ष्मी-गणेश पूजन का शुभ समय
  •  मध्य रात्रि में विशेष साधना: रात 12:06 से 2:19 बजे तक सिंह लग्न का विशेष महत्व 
  • 16 माला श्रीं मंत्र जाप: विशेष लक्ष्मी साधना में बीज मंत्र के जाप की धार्मिक मान्यता

पटना (Threesocieties.com Desk): दीपावली यानी दीपों का महापर्व। इस दिन हर घर में दीप जलेंगे, मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा होगी और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की जाएगी। लेकिन क्या आप जानते हैं कि दीपावली की रात पूजा के लिए केवल एक ही मुहूर्त नहीं होता? ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, गृहस्थों, कारोबारियों और विशेष साधना करने वाले साधकों के लिए अलग-अलग लग्न और पूजा विधान का महत्व बताया गया है।

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किसी के लिए शाम का वृषभ स्थिर लग्न शुभ माना जाता है तो कोई मध्य रात्रि के सिंह लग्न में मां लक्ष्मी की विशेष साधना करता है। वहीं, घर और दुकान में स्थापित किए जाने वाले गणेश जी की सूंड की दिशा को लेकर भी अलग-अलग धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। इस बार 8 नवंबर 2026 को दीपावली मनाई जाएगी। ज्योतिषाचार्यों के बताए मुहूर्त के अनुसार, इस दिन शाम से लेकर मध्य रात्रि तक पूजा और साधना के अलग-अलग अवसर हैं।

इसके साथ ही दीपावली पर मां लक्ष्मी के आठ स्वरूपों यानी अष्टलक्ष्मी की आराधना का भी विशेष महत्व है। आखिर गृहस्थों के लिए कौन सा मुहूर्त सबसे खास है? कारोबारियों को किस समय पूजा करनी चाहिए? मध्य रात्रि के सिंह लग्न में साधना क्यों महत्वपूर्ण मानी जाती है? और अष्टलक्ष्मी का वास्तविक अर्थ क्या है? आइए जानते हैं दीपावली 2026 के पूजा मुहूर्त, विधान और धार्मिक मान्यताओं की पूरी जानकारी।

एक दीपावली, पूजा के तीन अलग उद्देश्य; किसके लिए कौन सा मुहूर्त?

दीपावली पर लक्ष्मी पूजा का उद्देश्य केवल धन प्राप्त करना नहीं है। अलग-अलग लोग अपनी कामना और धार्मिक परंपराओं के अनुसार पूजा करते हैं। ज्योतिषीय मान्यताओं में इसे तीन प्रमुख उद्देश्यों से जोड़कर देखा जाता है।

1. गृहस्थों के लिए सुख-शांति और समृद्धि की पूजा

घर-परिवार में सुख, शांति, आरोग्य और आर्थिक संपन्नता की कामना करने वाले गृहस्थ शाम के शुभ मुहूर्त में गणेश-लक्ष्मी पूजन करते हैं। इस पूजा में भगवान गणेश को प्रथम पूज्य मानकर मां लक्ष्मी की आराधना की जाती है।

2. कारोबारियों के लिए व्यापार में उन्नति की पूजा

व्यापारी और कारोबारी अपने प्रतिष्ठानों में मां लक्ष्मी, भगवान गणेश और कुबेर की पूजा करते हैं। इसका उद्देश्य व्यापार में तरक्की, आर्थिक स्थिरता और कारोबार में आने वाली बाधाओं से मुक्ति की कामना करना होता है।

3. साधकों के लिए मध्य रात्रि की विशेष साधना

विशेष लक्ष्मी साधना करने वाले साधकों के लिए मध्य रात्रि के सिंह लग्न को महत्वपूर्ण माना जाता है। इस समय मंत्र जाप और विशेष अनुष्ठान करने की धार्मिक परंपरा है। इस तरह दीपावली की एक ही रात में पूजा के तीन अलग उद्देश्य सामने आते हैं। सामान्य गृहस्थों के लिए शाम का स्थिर लग्न विशेष महत्व रखता है, जबकि विशेष साधना करने वाले मध्य रात्रि के मुहूर्त को प्राथमिकता देते हैं।

शाम का वृषभ स्थिर लग्न गृहस्थों के लिए क्यों है खास?

पंडितों के अनुसार, दीपावली पर शाम के समय वृषभ लग्न को स्थिर लग्न माना जाता है। धार्मिक और ज्योतिषीय मान्यताओं में स्थिर लग्न में मां लक्ष्मी की पूजा करना शुभ माना गया है। उनके बताए अनुसार, 8 नवंबर को शाम 5:38 बजे से 7:34 बजे तक वृषभ स्थिर लग्न रहेगा। गृहस्थों के लिए इस दौरान गणेश-लक्ष्मी पूजन का विशेष महत्व बताया गया है। स्थिर लग्न को स्थिरता और टिकाऊ समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि इस समय मां लक्ष्मी की पूजा करने से घर में सुख-समृद्धि और आर्थिक स्थिरता की कामना पूरी होती है। दीपावली की शाम घरों में साफ-सफाई, दीप प्रज्वलन, रंगोली और पूजा की तैयारियां की जाती हैं। इसके बाद भगवान गणेश और मां लक्ष्मी की विधिवत पूजा की जाती है।

दीपावली 2026: जानिए दिनभर के प्रमुख लग्न और समय

दीपावली के दिन के प्रमुख मुहूर्त इस प्रकार हैं:

कुंभ लग्न: दोपहर 1 बजे से 2:03 बजे तक।

राहुकाल: दोपहर 3:50 बजे से शाम 5:13 बजे तक।

वृषभ स्थिर लग्न: शाम 5:38 बजे से 7:34 बजे तक।

सिंह लग्न: रात 12:06 बजे से 2:19 बजे तक।

इनमें शाम का वृषभ स्थिर लग्न गृहस्थों के लिए और मध्य रात्रि का सिंह लग्न विशेष साधना करने वालों के लिए महत्वपूर्ण बताया गया है। पूजा के समय में स्थान और स्थानीय पंचांग के अनुसार अंतर हो सकता है। इसलिए अपने शहर के पंचांग से समय की पुष्टि करना उचित होगा।

मध्य रात्रि का सिंह लग्न: विशेष लक्ष्मी साधना के लिए क्यों है महत्वपूर्ण?

दीपावली की रात मध्य रात्रि का समय विशेष लक्ष्मी साधना करने वाले साधकों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। ज्योतिषीय मान्यता के अनुसार, इस बार सिंह लग्न रात 12:06 बजे से 2:19 बजे तक रहेगा। इस दौरान मां लक्ष्मी की विशेष आराधना, मंत्र जाप और अनुष्ठान किए जाने की परंपरा है। धार्मिक मान्यता है कि दीपावली की रात मां लक्ष्मी पृथ्वी लोक का भ्रमण करती हैं। इसी विश्वास के आधार पर साधक रात्रि में जागरण, मंत्र जाप और विशेष पूजा करते हैं। हालांकि, यह विशेष साधना की परंपरा है। सामान्य गृहस्थों के लिए मध्य रात्रि तक जागकर पूजा करना आवश्यक नहीं माना जाता। वे शाम के शुभ मुहूर्त में श्रद्धापूर्वक लक्ष्मी-गणेश की पूजा कर सकते हैं।

16 माला श्रीं मंत्र जाप का क्या है महत्व?

मां लक्ष्मी की साधना में बीज मंत्र 'श्रीं' को विशेष महत्व दिया जाता है। ज्योतिषाचार्य के अनुसार, विशेष साधना के दौरान श्रीं बीज मंत्र की 16 माला जाप करने का विधान बताया गया है। इसके अलावा मां लक्ष्मी के इस मंत्र का जाप भी किया जाता है: ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं महालक्ष्म्यै नमः। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस मंत्र के जाप से साधक मां लक्ष्मी की कृपा और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं। मंत्र साधना में श्रद्धा, एकाग्रता और संकल्प को महत्वपूर्ण माना गया है। हालांकि, विशेष अनुष्ठान करने वाले साधकों को अपनी परंपरा और योग्य गुरु के निर्देशों के अनुसार ही साधना करनी चाहिए। सामान्य श्रद्धालुओं के लिए गणेश-लक्ष्मी पूजन, आरती और मंत्र जाप भी पर्याप्त धार्मिक परंपरा मानी जाती है।

घर और दुकान में गणेश जी की सूंड की दिशा का क्या है महत्व?

दीपावली पर मां लक्ष्मी के साथ भगवान गणेश की पूजा की जाती है। इस दौरान लोग घर और प्रतिष्ठान के लिए गणेश जी की प्रतिमा खरीदते हैं। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि धार्मिक मान्यताओं में गणेश जी की सूंड की दिशा को भी महत्व दिया जाता है।

घर के लिए वामावर्ती गणेश

घर में सामान्यतः बाईं ओर मुड़ी सूंड वाले गणेश जी यानी वामावर्ती गणेश की स्थापना की परंपरा प्रचलित है। इन्हें गृहस्थ जीवन में सुख-शांति, सौहार्द और पारिवारिक समृद्धि का प्रतीक माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इनकी पूजा गृहस्थों के लिए सरल और शुभ होती है।

दुकान और व्यापारिक प्रतिष्ठान के लिए दक्षिणावर्ती गणेश

व्यापारिक प्रतिष्ठानों में दाईं ओर मुड़ी सूंड वाले दक्षिणावर्ती गणेश की स्थापना की परंपरा भी प्रचलित है। धार्मिक मान्यताओं में इन्हें व्यापार में उन्नति, कार्यों में सफलता और सिद्धि से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, दक्षिणावर्ती गणेश की पूजा में विशेष नियमों और विधानों के पालन की मान्यता है। यह ध्यान रखना जरूरी है कि गणेश जी के दोनों स्वरूप पूजनीय हैं। सूंड की दिशा को लेकर प्रचलित मान्यताएं धार्मिक परंपराओं का हिस्सा हैं।

ऋषि विश्वामित्र और मां लक्ष्मी की साधना का क्या है संबंध?

मां लक्ष्मी की साधना का महत्व समझाने के लिए एक विश्वामित्र से जुड़ा एक प्रसंग है। प्रसंग के अनुसार आर्थिक कठिनाइयों और विपरीत परिस्थितियों के बीच ऋषि विश्वामित्र ने मां लक्ष्मी की साधना का संकल्प लिया था। उन्होंने दृढ़ निश्चय और श्रद्धा के साथ साधना की तथा अष्टलक्ष्मी की आराधना की। इस प्रसंग के माध्यम से यह समझाने का प्रयास किया गया कि लक्ष्मी साधना में केवल धन की कामना ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि संकल्प, श्रद्धा और जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में समृद्धि की कामना भी महत्वपूर्ण है।

अष्टलक्ष्मी का रहस्य: मां लक्ष्मी के आठ स्वरूप क्या बताते हैं?

मां लक्ष्मी के आठ स्वरूपों को अष्टलक्ष्मी कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ये आठ स्वरूप जीवन में समृद्धि के अलग-अलग आयामों का प्रतिनिधित्व करते हैं। अक्सर लक्ष्मी को केवल धन और संपत्ति की देवी के रूप में देखा जाता है, लेकिन अष्टलक्ष्मी की अवधारणा इससे कहीं व्यापक है। इसमें अन्न, साहस, संतान, ज्ञान, विजय, वैभव और आध्यात्मिक समृद्धि को भी लक्ष्मी के स्वरूप के रूप में समझाया गया है।

अष्टलक्ष्मी के आठ स्वरूप और उनका महत्व

1. आदिलक्ष्मी: आध्यात्मिक समृद्धि का स्वरूप

आदिलक्ष्मी को मां लक्ष्मी का मूल स्वरूप माना जाता है। इन्हें आध्यात्मिक शक्ति, शांति और जीवन के मूल आधार का प्रतीक माना गया है।

2. धनलक्ष्मी: आर्थिक संपन्नता की देवी

धनलक्ष्मी धन, संपत्ति, आर्थिक उन्नति और ऐश्वर्य का प्रतीक हैं। जीवन में आर्थिक स्थिरता और समृद्धि की कामना के लिए इनकी आराधना की जाती है।

3. धान्यलक्ष्मी: अन्न और पोषण का स्वरूप

धान्यलक्ष्मी अन्न, खाद्यान्न और पोषण की देवी मानी जाती हैं। जीवन में भोजन और अनाज की उपलब्धता को भी समृद्धि का महत्वपूर्ण आधार बताया गया है।

4. गजलक्ष्मी: वैभव और प्रतिष्ठा की प्रतीक

गजलक्ष्मी को ऐश्वर्य, वैभव, प्रतिष्ठा और राजसी संपन्नता का प्रतीक माना जाता है। इनकी आराधना जीवन में सम्मान और सुख-सुविधाओं की कामना से जुड़ी है।

5. संतानलक्ष्मी: परिवार और संतान सुख का स्वरूप

संतानलक्ष्मी परिवार की वृद्धि, संतान सुख और पारिवारिक खुशहाली का प्रतिनिधित्व करती हैं।

6. वीरलक्ष्मी: साहस और शक्ति की देवी

वीरलक्ष्मी को साहस, शक्ति, धैर्य और कठिन परिस्थितियों से लड़ने की क्षमता का प्रतीक माना जाता है। जीवन में चुनौतियों का सामना करने के लिए आंतरिक शक्ति भी समृद्धि का हिस्सा है।

7. विजयलक्ष्मी: सफलता और विजय का स्वरूप

विजयलक्ष्मी संघर्षों में सफलता, विजय और लक्ष्य प्राप्ति का प्रतीक हैं। जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में आगे बढ़ने और बाधाओं पर विजय पाने की कामना इनसे जुड़ी है।

8. विद्यालक्ष्मी: ज्ञान और विवेक की देवी

विद्यालक्ष्मी ज्ञान, शिक्षा, बुद्धि और विवेक का स्वरूप हैं। जीवन में सही निर्णय लेने और अज्ञानता दूर करने के लिए ज्ञान को सबसे महत्वपूर्ण संपत्तियों में माना गया है।

क्या केवल धन ही मां लक्ष्मी की कृपा है? अष्टलक्ष्मी देती हैं बड़ा संदेश

अष्टलक्ष्मी की अवधारणा हमें बताती है कि समृद्धि का अर्थ केवल बैंक बैलेंस, सोना-चांदी या बड़ी संपत्ति नहीं है। जिस घर में पर्याप्त अन्न है, परिवार में प्रेम और सुख है, व्यक्ति में साहस है, जीवन में ज्ञान है और समाज में सम्मान है, वहां भी समृद्धि के अलग-अलग स्वरूप मौजूद हैं। पंडितों  के अनुसार, दीपावली का वास्तविक संदेश केवल धन प्राप्त करना नहीं, बल्कि जीवन से नकारात्मकता और अज्ञान को दूर करना भी है। आर्थिक संपन्नता के साथ मानसिक शांति, पारिवारिक खुशहाली, शिक्षा, स्वास्थ्य और आत्मविश्वास भी जीवन की महत्वपूर्ण उपलब्धियां हैं। यही अष्टलक्ष्मी की अवधारणा का व्यापक संदेश है।

दीपावली का धार्मिक महत्व: भगवान राम की वापसी से समुद्र मंथन तक जुड़ी हैं मान्यताएं

दीपावली के पर्व को लेकर कई धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं। मान्यता है कि भगवान श्रीराम 14 वर्ष का वनवास पूरा कर और रावण पर विजय प्राप्त कर अयोध्या लौटे थे। उनके आगमन की खुशी में अयोध्यावासियों ने दीप जलाकर उनका स्वागत किया था। इसी परंपरा को दीपोत्सव से जोड़कर देखा जाता है।वहीं, समुद्र मंथन से मां लक्ष्मी के प्राकट्य की मान्यता भी दीपावली से जुड़ी है। इस कारण दीपावली को मां लक्ष्मी की आराधना का विशेष पर्व माना जाता है। इस दिन घरों की साफ-सफाई की जाती है, दीप जलाए जाते हैं और मां लक्ष्मी से परिवार में सुख-समृद्धि की प्रार्थना की जाती है।

दीप जलाने से आगे बढ़कर मन का अंधकार दूर करना ही दीपोत्सव का संदेश

दीपावली केवल घरों और बाजारों को रोशन करने का पर्व नहीं है। इसका आध्यात्मिक संदेश जीवन में सकारात्मकता, ज्ञान और सद्भाव का प्रकाश फैलाना भी है। दीप जलाने का अर्थ अंधकार को दूर करना है। इसी तरह जीवन में अज्ञान, नकारात्मकता, अहंकार और बुराइयों को दूर करने का संकल्प भी दीपावली का महत्वपूर्ण संदेश माना जाता है। इसलिए इस दीपावली मां लक्ष्मी से केवल धन-संपत्ति ही नहीं, बल्कि परिवार में सुख-शांति, जीवन में ज्ञान, कठिनाइयों से लड़ने का साहस और दूसरों की मदद करने की शक्ति भी मांगें। यही अष्टलक्ष्मी की आराधना का व्यापक अर्थ और दीपोत्सव का वास्तविक संदेश है।

डिस्क्लेमर: इस लेख में दी गई धार्मिक जानकारियां सामान्य सूचना और प्रचलित मान्यताओं पर आधारित हैं। Threesocieties.com इन मान्यताओं से जुड़े लाभों की स्वतंत्र पुष्टि या गारंटी नहीं करता। किसी व्रत, पूजा या अनुष्ठान की सही तिथि के लिए स्थानीय पंचांग का संदर्भ लें। Threesocieties.com अंधविश्वास के खिलाफ है और पाठकों से अनुरोध करता है कि वे जानकारी का उपयोग विवेक के साथ करें।