HighLights
- RTI एक्टिविस्ट पर सड़क निर्माण कार्य में बाधा डालने और मजदूरों को धमकाने का आरोप।
- पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट पहले ही जमानत देने से कर चुका था इनकार
- आरोपी के खिलाफ BNS और SC/ST एक्ट के तहत FIR दर्ज
नई दिल्ली (Threesocieties.com Desk): सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि "RTI एक्टिविज्म एक नया धंधा बन गया है।" शीर्ष अदालत ने यह टिप्पणी पंजाब के गुरदासपुर जिले में सड़क निर्माण कार्य में कथित रूप से बाधा डालने के आरोपी RTI एक्टिविस्ट राकेश कुमार बहल और उनके सहयोगी की अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए की।
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जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की अवकाशकालीन पीठ ने सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की भूमिका पर सवाल उठाए और पूछा कि सरकारी परियोजनाओं की निगरानी करने का अधिकार उन्हें किसने दिया है।
कोर्ट ने क्यों लगाई फटकार?
सुनवाई के दौरान जस्टिस संदीप मेहता ने कहा, "RTI एक्टिविज्म एक नया धंधा बन गया है। केंद्र सरकार ने फंड जारी किया है, वही सड़क निर्माण का काम देखेगी। आप कोई नहीं हैं। तथाकथित RTI एक्टिविस्ट।" वहीं जस्टिस विजय बिश्नोई ने भी सख्त रुख अपनाते हुए पूछा, "इन सभी सड़कों के निर्माण की निगरानी करने वाले आप कौन होते हैं? क्या आप कोई उच्च अधिकारी हैं?" कोर्ट की इन टिप्पणियों को RTI एक्टिविज्म के दुरुपयोग को लेकर एक महत्वपूर्ण संदेश के रूप में देखा जा रहा है।
क्या है पूरा मामला?
एफआईआर के अनुसार, राकेश कुमार बहल और उनके सहयोगी राजीव कुमार उर्फ मिंटू पर आरोप है कि उन्होंने पंजाब के बटाला क्षेत्र में चल रहे सड़क निर्माण कार्य में हस्तक्षेप किया। शिकायत में कहा गया है कि दोनों आरोपियों ने निर्माण कार्य की देखरेख कर रहे व्यक्ति को धमकाया, मजदूरों के साथ अभद्र व्यवहार किया और काम रुकवाने की कोशिश की। इतना ही नहीं, शिकायतकर्ता को चोट पहुंचाने का भी आरोप लगाया गया है। इन आरोपों के आधार पर उनके खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम के तहत मामला दर्ज किया गया।
हाई कोर्ट से भी नहीं मिली थी राहत
राकेश कुमार बहल ने पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के 14 मई के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी। हाई कोर्ट ने भी अग्रिम जमानत देने से इनकार करते हुए कहा था कि एफआईआर में दर्ज आरोपों से सरकारी कार्य में बाधा डालने में उनकी स्पष्ट भूमिका सामने आती है। हालांकि बहल की ओर से अदालत में यह दलील दी गई कि उन्होंने सड़क निर्माण कार्य में कथित भ्रष्टाचार को उजागर किया था और इसी वजह से उन्हें झूठे मामले में फंसाया गया है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और राहत देने से इनकार कर दिया।
RTI एक्टिविज्म पर बहस तेज
सुप्रीम कोर्ट की इस टिप्पणी के बाद RTI एक्टिविज्म की भूमिका और उसके कथित दुरुपयोग को लेकर नई बहस छिड़ सकती है। जहां एक ओर सूचना का अधिकार अधिनियम पारदर्शिता और जवाबदेही का महत्वपूर्ण माध्यम माना जाता है, वहीं अदालत की टिप्पणी यह संकेत देती है कि इसके नाम पर सरकारी कार्यों में अनावश्यक हस्तक्षेप को न्यायपालिका गंभीरता से देख रही है। यह फैसला भविष्य में ऐसे मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी संदर्भ बन सकता है, जहां RTI एक्टिविज्म और सरकारी कार्यों में हस्तक्षेप के बीच की सीमा पर सवाल उठते हैं।