Highlights:
- 61.67 करोड़ रुपये के कथित वित्तीय विवाद में संजय और सचिन अग्रवाल जेल से रिहा
- दोनों 25 सितंबर 2025 से न्यायिक हिरासत में थे, पांच मामलों में चार में नियमित जमानत मिली
- कोलकाता के हेयर स्ट्रीट थाना केस में सुप्रीम कोर्ट से अंतरिम संरक्षण, गोविंदपुर और बैंक मोड़ मामलों में भी राहत
- विमला फ्यूल्स एंड मेटल्स की CIRP प्रक्रिया से जुड़ा है पूरा विवाद - प्रारंभिक ऑडिट रिपोर्ट में 61.67 करोड़ रुपये के लेन-देन पर सवाल
धनबाद (Threesocieties.com Desk): करीब 61 करोड़ 67 लाख रुपये के कथित वित्तीय लेन-देन और वसूली से जुड़े बहुचर्चित मामले में संजय कुमार अग्रवाल और सचिन कुमार अग्रवाल को बड़ी कानूनी राहत मिली है। अलग-अलग राज्यों में दर्ज पांच मामलों में से चार में नियमित जमानत और कोलकाता के एक मामले में अंतरिम संरक्षण मिलने के बाद दोनों जेल से रिहा हो गए हैं। दोनों 25 सितंबर 2025 से न्यायिक हिरासत में थे। लंबे समय तक चली कानूनी लड़ाई के बाद मिली इस राहत से परिवार ने बड़ी राहत की सांस ली है। वहीं, इस पूरे घटनाक्रम में संजय अग्रवाल के बेटे प्रेम अग्रवाल की सक्रियता और लगातार किए गए प्रयासों की भी चर्चा हो रही है।
यह मामला केवल दो व्यक्तियों की गिरफ्तारी और रिहाई तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तार कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया, वित्तीय लेन-देन की ऑडिट रिपोर्ट, कई राज्यों में दर्ज पुलिस मामलों और करोड़ों रुपये की कथित वसूली के विवाद से जुड़े हैं।
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61.67 करोड़ रुपये के कथित वित्तीय लेन-देन से जुड़ा है मामला
इस पूरे प्रकरण का संबंध विमला फ्यूल्स एंड मेटल्स लिमिटेड की कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) से है। यह प्रक्रिया राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT), अहमदाबाद के समक्ष चल रही है। NCLT की ओर से नियुक्त अंतरिम समाधान पेशेवर (IRP) अनिल कुमार सत्यनारायण अग्रवाल के निर्देश पर कंपनी के वित्तीय लेन-देन की जांच के लिए चार्टर्ड अकाउंटेंट फर्म मेसर्स आर.आर. तिबरेवाला एंड कंपनी को नियुक्त किया गया था। फर्म ने वित्तीय वर्ष 2024 से 2026 तक के लेन-देन की प्रारंभिक ट्रांजैक्शन ऑडिट रिपोर्ट तैयार की। इसी रिपोर्ट में सामने आए कुछ वित्तीय लेन-देन को लेकर विवाद गहराया और मामला कानूनी कार्रवाई तक पहुंचा।
प्रारंभिक ऑडिट रिपोर्ट में 61.67 करोड़ के लेन-देन पर सवाल
इस मामले का एक महत्वपूर्ण पहलू प्रारंभिक ऑडिट रिपोर्ट में दर्ज निष्कर्ष हैं। रिपोर्ट के अनुसार, नारायणी कोक प्राइवेट लिमिटेड और हर्ष फ्यूल्स प्राइवेट लिमिटेड ने विमला फ्यूल्स एंड मेटल्स लिमिटेड से बकाया राशि प्राप्त करने का दावा किया था। हालांकि, ऑडिट रिपोर्ट में संबंधित सामग्री की बिक्री और उससे प्राप्त धनराशि के प्रवाह को लेकर सवाल उठाए गए हैं। रिपोर्ट में उल्लेख किया गया है कि संबंधित सामग्री कथित तौर पर बेच दी गई और उसकी बिक्री से प्राप्त धनराशि संयुक्त अरब अमीरात (UAE) स्थित वान्या रिसोर्सेज एफजेड-एलएलसी को प्राप्त हुई। इसके साथ ही रिपोर्ट में इन कंपनियों को संबंधित सामग्री के लिए विमला फ्यूल्स एंड मेटल्स लिमिटेड से लगभग 61 करोड़ 67 लाख रुपये की अग्रिम राशि प्राप्त होने की बात कही गई है।
प्रारंभिक ऑडिट रिपोर्ट में इन लेन-देन को कथित धोखाधड़ीपूर्ण और तरजीही लेन-देन की श्रेणी में रखा गया है। रिपोर्ट के आधार पर नारायणी ग्रुप और पवन मोरे से जुड़े पक्षों के विरुद्ध 61 करोड़ रुपये से अधिक की वसूली का मामला भी सामने आया है। रिपोर्ट में ईरान के एक बंदरगाह पर रखे स्टॉक की बिक्री और उससे प्राप्त धनराशि के प्रवाह का भी उल्लेख करते हुए संबंधित लेन-देन पर सवाल उठाए गए हैं। हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि ऑडिट रिपोर्ट में दर्ज निष्कर्ष प्रारंभिक हैं। इन्हें अंतिम न्यायिक निष्कर्ष या किसी पक्ष का दोष साबित होने के रूप में नहीं देखा जा सकता। संबंधित आरोपों पर अंतिम निर्णय न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगा।
पांच मामलों में चार में नियमित जमानत, एक में अंतरिम संरक्षण
प्रेस विज्ञप्ति में दी गई जानकारी के अनुसार, संजय कुमार अग्रवाल और सचिन कुमार अग्रवाल के खिलाफ अलग-अलग राज्यों में कुल पांच मामले दर्ज हैं। इन मामलों में विभिन्न अदालतों से उन्हें कानूनी राहत मिली है।
1. अहमदाबाद का मामला: अहमदाबाद के डीसीबी पुलिस थाने में दर्ज FIR संख्या 11191011250184/2025 में 15 अक्टूबर 2025 को सत्र न्यायालय, अहमदाबाद से नियमित जमानत मिली।
2. गांधीधाम का मामला: गुजरात के गांधीधाम पुलिस थाने में दर्ज FIR संख्या 11993007250131/2025 में 17 जुलाई 2026 को सर्वोच्च न्यायालय से नियमित जमानत प्राप्त हुई।
3. गोविंदपुर का मामला: धनबाद के गोविंदपुर थाना कांड संख्या 498/2025 में 10 जून 2026 को झारखंड उच्च न्यायालय, रांची से नियमित जमानत मिली।
4. बैंक मोड़ का मामला: धनबाद के बैंक मोड़ थाना कांड संख्या 280/2025 में 15 अक्टूबर 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने नियमित जमानत प्रदान की।
5. कोलकाता का मामला: कोलकाता के हेयर स्ट्रीट थाना कांड संख्या 131/2025 में 14 अक्टूबर 2026 को सर्वोच्च न्यायालय ने अग्रिम जमानत की कार्यवाही के दौरान अंतरिम संरक्षण प्रदान किया।
इस प्रकार चार मामलों में नियमित जमानत और पांचवें मामले में अंतरिम संरक्षण मिलने के बाद दोनों की जेल से रिहाई का रास्ता साफ हुआ। यहां यह समझना जरूरी है कि कोलकाता मामले में मिला अंतरिम संरक्षण नियमित जमानत के समान नहीं है। दोनों अलग-अलग कानूनी राहत हैं।
पवन मोर और नारायणी ग्रुप से जुड़ा विवाद भी चर्चा में
इस पूरे प्रकरण में पवन मोर और उनकी पत्नी संतोष मोर की ओर से गांधीधाम में शिकायत दर्ज कराए जाने का उल्लेख है। वहीं, नारायणी कोक प्राइवेट लिमिटेड की ओर से उसके कर्मचारी अनूप शर्मा द्वारा धनबाद के बैंक मोड़ थाने में भी शिकायत दर्ज कराए जाने की जानकारी प्रेस विज्ञप्ति में दी गई है।दूसरी ओर, संजय अग्रवाल और उनके परिवार का पक्ष है कि पवन मोरे और संतोष मोरे की ओर से लगाए गए आरोप गलत और निराधार हैं। परिवार का दावा है कि प्रारंभिक ऑडिट रिपोर्ट उनके उस पक्ष को समर्थन देती है, जिसमें उन्होंने गांधीधाम मामले में अपने विरुद्ध लगाए गए आरोपों को चुनौती दी है।हालांकि, मामले से जुड़े सभी पक्षों के आरोपों और दावों का अंतिम परीक्षण न्यायिक प्रक्रिया के तहत होना बाकी है।
पिता और चाचा की रिहाई के लिए प्रेम अग्रवाल के लगातार प्रयास
इस पूरे घटनाक्रम का एक भावनात्मक और मानवीय पक्ष संजय अग्रवाल के बेटे प्रेम अग्रवाल के संघर्ष से भी जुड़ा है। परिवार से मिली जानकारी के अनुसार, पिता संजय अग्रवाल और चाचा सचिन अग्रवाल की रिहाई के लिए प्रेम अग्रवाल लगातार प्रयासरत रहे। अलग-अलग राज्यों में मुकदमे, विभिन्न न्यायालयों की प्रक्रियाएं और लंबे समय तक परिजनों का न्यायिक हिरासत में रहना परिवार के लिए बेहद चुनौतीपूर्ण दौर था। ऐसे कठिन समय में प्रेम अग्रवाल ने कानूनी मामलों की जानकारी जुटाने, अधिवक्ताओं के साथ लगातार संपर्क बनाए रखने और आवश्यक कानूनी प्रक्रियाओं में सक्रिय भूमिका निभाने के लिए निरंतर प्रयास किए।
परिवार के अनुसार, उन्होंने दिन-रात मेहनत करते हुए अपने पिता और चाचा की रिहाई के लिए हरसंभव कोशिश की। अब जब दोनों को विभिन्न मामलों में कानूनी राहत मिलने के बाद जेल से रिहाई मिली है, तो यह परिवार के लिए बड़ी राहत का क्षण है। इस पूरे संघर्ष में प्रेम अग्रवाल की सक्रियता, धैर्य और परिवार के प्रति जिम्मेदारी भी चर्चा का विषय बनी हुई है।
राखी अग्रवाल को भी अप्रैल 2026 में मिली थी जमानत
इस प्रकरण में श्रीमती राखी अग्रवाल को भी अप्रैल 2026 में धनबाद के सक्षम न्यायालय से नियमित जमानत मिल चुकी थी। प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, वह एक महीने से अधिक समय तक हिरासत में रही थीं। उनकी जमानत की कार्यवाही संजय अग्रवाल और सचिन अग्रवाल के मामलों से अलग थी। इस तरह परिवार के अलग-अलग सदस्यों को विभिन्न न्यायालयों से अलग-अलग समय पर कानूनी राहत मिली।
सर्वोच्च न्यायालय में शादाब और जरताब अनवर ने की पैरवी
प्रेस विज्ञप्ति में दी गई जानकारी के अनुसार, सर्वोच्च न्यायालय में प्रैक्टिस करने वाले अधिवक्ता शादाब अनवर और जरताब अनवर ने संजय कुमार अग्रवाल, सचिन कुमार अग्रवाल तथा राखी अग्रवाल की ओर से कानूनी पैरवी की। दोनों अधिवक्ता धनबाद के वरिष्ठ अधिवक्ता मुख्तार अहमद के पुत्र हैं। वहीं, अधिवक्ता शहनवाज अब्दुल मलिक ने पवन मोरे और उनसे जुड़ी कंपनियों की ओर से धनबाद न्यायालयों में संबंधित मामलों में पैरवी की थी। इस प्रकार इस पूरे प्रकरण में दोनों पक्षों की ओर से अलग-अलग न्यायालयों में कानूनी लड़ाई जारी रही।
जमानत मिलना दोषमुक्ति नहीं, आगे भी जारी रहेगी न्यायिक प्रक्रिया
कानूनी दृष्टिकोण से यह समझना महत्वपूर्ण है कि जमानत और दोषमुक्ति दो अलग-अलग अवधारणाएं हैं। जमानत मिलने का अर्थ है कि न्यायालय ने निर्धारित शर्तों के अधीन मुकदमे की सुनवाई लंबित रहने के दौरान संबंधित व्यक्ति को रिहा करने की अनुमति दी है। इसे आरोपों से अंतिम रूप से बरी होना या दोषमुक्त घोषित किया जाना नहीं माना जा सकता। इसी तरह, प्रारंभिक ऑडिट रिपोर्ट में दर्ज निष्कर्ष भी अंतिम न्यायिक फैसला नहीं हैं। अब इस पूरे प्रकरण में सबकी नजर NCLT अहमदाबाद में चल रही कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया और विभिन्न न्यायालयों में लंबित मामलों की आगे की सुनवाई पर रहेगी।
फिलहाल, संजय अग्रवाल और सचिन अग्रवाल की जेल से रिहाई उनके परिवार के लिए बड़ी राहत है। वहीं, लंबे कानूनी संघर्ष के दौरान प्रेम अग्रवाल के प्रयास, परिवार का धैर्य और अधिवक्ताओं की कानूनी पैरवी इस पूरे घटनाक्रम के महत्वपूर्ण पहलू बनकर सामने आए हैं।
नोट: इस खबर में मामले से जुड़े तथ्यों और कानूनी राहत की जानकारी उपलब्ध कराई गई प्रेस विज्ञप्ति एवं संबंधित पक्षों के दावों पर आधारित है। आरोपों, ऑडिट रिपोर्ट के निष्कर्षों और संबंधित पक्षों के दावों पर अंतिम निर्णय सक्षम न्यायालय द्वारा किया जाना है।