HighLights:

  • नागपुर में RSS के विजयादशमी उत्सव में सरसंघचालक मोहन भागवत का संबोधन
  • कैप्टन स्मित मच्छर के साहस और कर्तव्यनिष्ठा से प्रेरणा लेने का संदेश
  • संघ के शताब्दी वर्ष में 10.19 करोड़ से अधिक घरों तक संपर्क करने का दावा
  • सामाजिक बदलाव के लिए पंच परिवर्तन की पांच पहलों पर जोर

नागपुर (Threesocieties.com Desk): राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने नागपुर में आयोजित विजयादशमी उत्सव के दौरान समाज में आत्मबोध, राष्ट्रीय एकता और सामाजिक समरसता को मजबूत करने पर जोर दिया। संघ के शताब्दी वर्ष के अवसर पर दिए गए अपने संबोधन में उन्होंने भारत की सांस्कृतिक पहचान, सनातन जीवन-दृष्टि, सामाजिक जिम्मेदारी और वर्तमान वैश्विक चुनौतियों पर विस्तार से विचार रखे। उन्होंने कहा कि भारत की विविधता में एकता उसकी सबसे बड़ी ताकत है और इस एकता को बनाए रखने के लिए समाज के प्रत्येक व्यक्ति को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी।

अपने संबोधन में मोहन भागवत ने कैप्टन स्मित मच्छर के साहस और मानवीय संवेदना का उल्लेख करते हुए कहा कि दूसरों की रक्षा के लिए अपने प्राणों की परवाह किए बिना आगे बढ़ने की प्रेरणा भारतीय संस्कारों और समाज के प्रति कर्तव्यबोध से मिलती है। उन्होंने संगठित और शक्तिशाली हिंदू समाज की आवश्यकता पर बल देते हुए स्पष्ट किया कि इसका उद्देश्य सभी पंथों का सम्मान, सद्भाव और राष्ट्रीय भावनात्मक एकता को मजबूत करना है।

भागवत ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), सोशल मीडिया, ओटीटी प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध सामग्री और युवाओं में नशे की बढ़ती प्रवृत्ति को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि विज्ञान और तकनीक का उपयोग मानव कल्याण के लिए होना चाहिए। तकनीकी प्रगति के साथ विवेक, नैतिकता और सामाजिक जिम्मेदारी का होना जरूरी है। नई पीढ़ी को सही और गलत के बीच अंतर समझाने में परिवार, विद्यालय, समाज और शासन की महत्वपूर्ण भूमिका है।

कैप्टन स्मित मच्छर से प्रेरणा लेने की अपील

विजयादशमी उत्सव के दौरान मोहन भागवत ने कैप्टन स्मित मच्छर के साहस और कर्तव्यनिष्ठा का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि दूसरों के संरक्षण के लिए अपनी जान की परवाह किए बिना आगे बढ़ने का भाव समाज में मौजूद संस्कारों और मानवीय संवेदना का परिचायक है। भागवत के अनुसार, संगठित और शक्तिशाली हिंदू समाज की बात करना सभी पंथों के सम्मान या राष्ट्रीय एकता के विरुद्ध नहीं है। हिंदू समाज का विचार और स्वभाव समावेशी है। इसलिए संघ का कार्य भावनात्मक एकात्मता, सद्भावना और सदाचार को मजबूत करने वाला होना चाहिए।उन्होंने कहा कि समाज में परस्पर विश्वास, सहयोग और अपनत्व की भावना को मजबूत करना आवश्यक है। राष्ट्रीय एकता केवल भाषणों या नारों से नहीं, बल्कि व्यक्ति के व्यवहार, आचरण और सामाजिक जिम्मेदारी निभाने से मजबूत होती है।

भारत की विविधता में एकता ही सबसे बड़ी ताकत

मोहन भागवत ने कहा कि भारत विभिन्न भाषाओं, जातियों, पंथों, प्रांतों, खानपान और रीति-रिवाजों वाला देश है। इतनी व्यापक विविधता के बावजूद देश को एक सूत्र में बांधने वाली शक्ति उसकी साझा सांस्कृतिक चेतना और परस्पर अपनत्व की भावना है। उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति का अपनी भाषा, जाति, क्षेत्र या पंथ से जुड़ाव स्वाभाविक है, लेकिन इन पहचानों से ऊपर साझा राष्ट्रीयता का भाव होना चाहिए। जब समाज व्यापक राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता देता है, तब एकता मजबूत होती है। इसके विपरीत, संकीर्ण पहचान और आपसी अविश्वास समाज को कमजोर कर सकते हैं।

भागवत ने संविधान की प्रस्तावना में दर्ज 'हम भारत के लोग' का उल्लेख करते हुए इसे सामूहिक राष्ट्रीय पहचान और भावनात्मक एकता का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि भारत की विविधता को स्वीकार करने के साथ सभी नागरिकों के सम्मान, सुरक्षा और समान अवसरों का ध्यान रखना आवश्यक है। उन्होंने भारतीय परंपरा की समावेशी दृष्टि का उल्लेख करते हुए कहा कि विविधताओं के बीच एकता को समझना और उसे अपने आचरण में उतारना जरूरी है। भारत की सांस्कृतिक परंपरा समय के अनुसार आवश्यक बदलावों को स्वीकार करने की क्षमता भी रखती है, लेकिन जीवन के मूल मानवीय मूल्यों को बनाए रखना महत्वपूर्ण है।

संत रविदास, स्वामी श्रद्धानंद और स्वामी लक्ष्मणानंद का स्मरण

अपने संबोधन में सरसंघचालक ने संत शिरोमणि रविदास, स्वामी श्रद्धानंद, स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती और राजनारायण बसु जैसी विभूतियों के योगदान का उल्लेख किया।उन्होंने कहा कि इन महापुरुषों के जीवन से सामाजिक समरसता, सेवा, त्याग, सांस्कृतिक चेतना और समाज को संगठित करने की प्रेरणा मिलती है। विपरीत परिस्थितियों में भी संतों और समाज सुधारकों ने लोगों को जोड़ने, स्वधर्म के प्रति जागरूकता पैदा करने और सामाजिक बुराइयों से संघर्ष करने का कार्य किया।

स्वामी श्रद्धानंद को आर्य समाज के प्रमुख संन्यासी, शिक्षाविद और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े व्यक्तित्व के रूप में याद किया गया। वहीं, स्वामी लक्ष्मणानंद सरस्वती के जीवन और वनवासी क्षेत्रों में किए गए सेवा कार्यों का उल्लेख हुआ। राजनारायण बसु के योगदान को भी सांस्कृतिक आत्मबोध और स्वदेशी चेतना के संदर्भ में याद किया गया।भागवत के अनुसार, ऐसी विभूतियों का स्मरण केवल ऐतिहासिक व्यक्तित्वों को याद करने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उनके आदर्शों को वर्तमान जीवन में अपनाने का प्रयास भी होना चाहिए।

संघ के शताब्दी वर्ष में 10 करोड़ से अधिक परिवारों तक संपर्क का दावा

मोहन भागवत ने संघ के शताब्दी वर्ष के दौरान आयोजित जनसंपर्क और सामाजिक जागरण कार्यक्रमों का विवरण भी प्रस्तुत किया। उनके संबोधन में दिए गए आंकड़ों के अनुसार, स्वयंसेवकों ने देशभर में व्यापक संपर्क अभियान चलाया।

4,61,527 गांवों तक संपर्क अभियान पहुंचने का दावा किया गया।

41,076 नगरीय बस्तियों में संपर्क किया गया।

10,19,88,511 घरों तक पहुंचने की जानकारी दी गई।

1,117 जिलों में प्रबुद्ध नागरिक गोष्ठियां आयोजित की गईं।

इन गोष्ठियों में 4,26,497 महिला एवं पुरुषों की भागीदारी बताई गई।

5,036 खंडों में सामाजिक सद्भावना बैठकें आयोजित की गईं।

34,187 मंडलों में हिंदू सम्मेलन किए गए।

युवा सम्मेलनों में 39,25,225 युवाओं के शामिल होने का उल्लेख किया गया।

भागवत ने कहा कि शताब्दी वर्ष का उद्देश्य केवल कार्यक्रम आयोजित करना नहीं, बल्कि समाज के विभिन्न वर्गों के बीच संवाद, संपर्क और सहयोग को बढ़ावा देना है। इन पहलों को आगे भी जारी रखने की जरूरत है, ताकि सामाजिक सहभागिता और राष्ट्रीय चेतना मजबूत हो सके। उन्होंने यह भी कहा कि विदेशों में भारत, हिंदू समाज और संघ के कार्यों को लेकर जिज्ञासा बढ़ रही है। ऐसे में संवाद और विचारों के आदान-प्रदान को लगातार आगे बढ़ाना जरूरी है।

पंच परिवर्तन से समाज में सकारात्मक बदलाव का संदेश

मोहन भागवत ने समाज में स्थायी परिवर्तन लाने के लिए 'पंच परिवर्तन' की अवधारणा पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि ये पांच पहल केवल किसी एक वर्ष का अभियान नहीं, बल्कि दैनिक जीवन में अपनाए जाने वाले व्यवहार और आदतों का हिस्सा होनी चाहिए।

1. सामाजिक समरसता: समाज से भेदभाव समाप्त करने, सभी के सम्मान और परस्पर सद्भाव को मजबूत करने पर जोर दिया गया।

2. कुटुंब प्रबोधन: परिवार में संस्कार, आत्मीयता, जिम्मेदारी और पीढ़ियों के बीच संवाद को मजबूत करने की आवश्यकता बताई गई।

3. पर्यावरण संरक्षण: प्रकृति के प्रति जिम्मेदारी निभाने, संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करने और पर्यावरण के अनुकूल जीवनशैली अपनाने का संदेश दिया गया।

4. स्वबोध एवं स्वदेशी: अपनी सांस्कृतिक पहचान को समझने, स्थानीय उत्पादों और स्वदेशी विचारों को प्रोत्साहित करने तथा आत्मनिर्भरता की भावना मजबूत करने पर बल दिया गया।

5. नागरिक अनुशासन: कानून, सामाजिक नियमों और नागरिक कर्तव्यों का पालन करने तथा सार्वजनिक जीवन में जिम्मेदार व्यवहार अपनाने की अपील की गई।

भागवत ने कहा कि सकारात्मक बदलाव नियमित अभ्यास से आता है। जब कोई अच्छा व्यवहार व्यक्ति के जीवन का हिस्सा बनता है, तो धीरे-धीरे उसका प्रभाव परिवार और समाज पर भी पड़ता है।

AI और आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल विवेक के साथ हो

तकनीकी विकास पर चर्चा करते हुए सरसंघचालक ने कहा कि विज्ञान और आधुनिक तकनीक का स्वागत किया जाना चाहिए, लेकिन इनका उपयोग विवेक और नैतिकता के साथ होना जरूरी है। उन्होंने कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) जैसी नई तकनीकों का उल्लेख करते हुए कहा कि तकनीक मानव जीवन को बेहतर बनाने का साधन है, न कि स्वयं जीवन का अंतिम उद्देश्य। यदि इसका उपयोग बिना नैतिक अनुशासन और जिम्मेदारी के किया जाता है, तो इसके नकारात्मक परिणाम सामने आ सकते हैं।

उन्होंने कहा कि केवल भौतिक सुविधाओं और उपभोग पर आधारित विकास से मनुष्य और प्रकृति दोनों को नुकसान हो सकता है। विकास की प्रक्रिया में पर्यावरण, मानवीय मूल्यों और सामाजिक संतुलन को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। भागवत ने हिमालयी क्षेत्र और नेपाल में आई प्राकृतिक आपदाओं का उल्लेख करते हुए पर्यावरणीय संतुलन की आवश्यकता पर ध्यान दिलाया। उनका संदेश था कि विकास की योजनाओं में प्रकृति की सुरक्षा और दीर्घकालिक प्रभावों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।

ओटीटी कंटेंट और युवाओं में नशे की प्रवृत्ति पर चिंता

मोहन भागवत ने नई पीढ़ी के सामने मौजूद सामाजिक और नैतिक चुनौतियों पर भी विचार रखे। उन्होंने कहा कि डिजिटल माध्यमों और सोशल मीडिया के विस्तार से जानकारी तक पहुंच आसान हुई है, लेकिन हर जानकारी सही या उपयोगी हो, यह जरूरी नहीं है। उन्होंने ओटीटी प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध सामग्री को लेकर सामाजिक चिंता का उल्लेख किया और कहा कि इस विषय पर शासन को विचार करना चाहिए। साथ ही, बच्चों और युवाओं में सही-गलत का अंतर समझने की क्षमता विकसित करना आवश्यक है।

नशे की बढ़ती प्रवृत्ति को गंभीर समस्या बताते हुए उन्होंने सरकार, प्रशासन, परिवार और समाज से मिलकर प्रयास करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि केवल नियम बनाने से सभी समस्याओं का समाधान नहीं होगा। बच्चों को अच्छे संस्कार देना, उनके साथ संवाद बनाए रखना और जिम्मेदार व्यवहार की प्रेरणा देना भी जरूरी है।अभिभावकों की भूमिका पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि परिवार बच्चों के व्यक्तित्व निर्माण का पहला केंद्र है। परिवार, विद्यालय और सामाजिक वातावरण में मिलने वाले संस्कार युवाओं के भविष्य को प्रभावित करते हैं। इसलिए नई पीढ़ी को शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक और नैतिक रूप से सक्षम बनाने की जरूरत है।

पर्यावरण और नैतिकता के संतुलन से हो विकास

भागवत ने कहा कि विकास का अर्थ केवल आर्थिक प्रगति, औद्योगिक विस्तार और भौतिक सुविधाओं में वृद्धि नहीं है। वास्तविक विकास वह है, जिसमें मनुष्य, समाज और प्रकृति के बीच संतुलन बना रहे। उन्होंने कहा कि अनियंत्रित उपभोग और प्रकृति के संसाधनों के अत्यधिक दोहन से पर्यावरणीय संकट गहरा सकता है। भारत को ऐसा विकास मॉडल अपनाने की जरूरत है, जो आर्थिक उन्नति के साथ पर्यावरण संरक्षण, संयम और मानवीय मूल्यों को भी महत्व दे। उनके अनुसार, भारतीय जीवन-दृष्टि व्यक्ति और प्रकृति के बीच परस्पर संबंध को महत्व देती है। इस दृष्टिकोण के आधार पर भारत दुनिया को संतुलित और टिकाऊ विकास का रास्ता दिखाने में योगदान दे सकता है।

हिंदू दृष्टि को किसी एक पूजा पद्धति तक सीमित नहीं माना

मोहन भागवत ने हिंदू समाज और हिंदू दृष्टि की व्यापकता पर भी विचार रखे। उन्होंने कहा कि इसे किसी विशेष पूजा पद्धति, भाषा, खानपान, जाति या राजनीतिक विचारधारा तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार, आध्यात्मिकता, मानवता, विश्व बंधुत्व और परस्पर सम्मान भारतीय जीवन-दृष्टि के महत्वपूर्ण तत्व हैं। भारत की राष्ट्रीय चेतना को मजबूत करने के लिए सभी समुदायों के बीच विश्वास और सहयोग की भावना आवश्यक है। उन्होंने कहा कि संगठित समाज का निर्माण सभी पंथों के सम्मान और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करने के साथ होना चाहिए। सामाजिक जीवन में सद्भाव केवल विचारों से नहीं, बल्कि वाणी, व्यवहार और कर्म में दिखाई देना चाहिए। भागवत ने यह भी कहा कि इतिहास से जुड़ी आशंकाओं को वर्तमान सामाजिक संबंधों में अविश्वास और संघर्ष का कारण नहीं बनने देना चाहिए। समाज को बांटने और लोगों को उकसाकर विवाद पैदा करने वाली प्रवृत्तियों से सतर्क रहना जरूरी है।

सरकार और समाज दोनों की जिम्मेदारी

सरसंघचालक ने कहा कि सामाजिक समस्याओं का समाधान केवल सरकार या आंदोलनों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। इसके लिए नागरिकों की सक्रिय भागीदारी, संवाद और सामूहिक प्रयास जरूरी हैं। उन्होंने कहा कि सरकार और प्रशासन को नीतियों को लागू करते समय नागरिकों की संवेदनशीलता, सम्मान और स्थानीय परिस्थितियों का ध्यान रखना चाहिए। वहीं, समाज को भी समस्याओं के समाधान के लिए रचनात्मक पहल करनी चाहिए। उनके अनुसार, आंदोलनों का उद्देश्य समस्याओं का समाधान होना चाहिए, न कि सामाजिक विभाजन को बढ़ावा देना। राजनीतिक लाभ और तात्कालिक लोकप्रियता की तुलना में विवेक, सद्भाव और राष्ट्रीय हित को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

भागवत ने शिक्षा के क्षेत्र में स्वयंसेवकों और ग्रामीणों के सहयोग से हुए प्रयासों का भी उल्लेख किया। संबोधन में 21 प्रांतों के 210 जिलों के लगभग 1,296 विद्यालयों में सकारात्मक बदलाव की जानकारी दी गई। इन प्रयासों में विद्यार्थियों की उपस्थिति, सीखने के स्तर, अभिभावकों की सहभागिता और विद्यालयों की आधारभूत सुविधाओं में सुधार का उल्लेख किया गया। उन्होंने कहा कि शिक्षा, खेलकूद, सांस्कृतिक गतिविधियों और सामाजिक सेवा में समुदाय की भागीदारी से आत्मनिर्भरता और जिम्मेदारी की भावना मजबूत होती है।

'वंदे मातरम्' और राष्ट्रीय चेतना का उल्लेख

अपने संबोधन में मोहन भागवत ने बंगाल विभाजन के विरोध और 'वंदे मातरम्' की ऐतिहासिक भूमिका का भी उल्लेख किया। उन्होंने इसे राष्ट्रीय एकता और देशभक्ति की भावना से जोड़ा।उन्होंने कहा कि मातृभूमि के प्रति सम्मान, साझा ऐतिहासिक विरासत और भारतीय संस्कृति के मूल्यों को समझना समाज को जोड़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। छोटी-छोटी पहचानों के कारण एकता के व्यापक आधार को कमजोर नहीं होने देना चाहिए। भागवत के अनुसार, देश की विविधताओं को अलगाव का कारण मानने के बजाय उनके बीच संवाद, सम्मान और अपनत्व को बढ़ावा देना चाहिए।

वैश्विक चुनौतियों के बीच भारत की भूमिका

मोहन भागवत ने कहा कि विश्व इस समय राजनीतिक तनाव, आर्थिक अनिश्चितता, पर्यावरणीय संकट और सामाजिक विघटन जैसी कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे दौर में भारत को अपनी सांस्कृतिक जीवन-दृष्टि, मानवीय मूल्यों और संतुलित विकास की अवधारणा के आधार पर योगदान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय सुरक्षा, सामाजिक न्याय, एकता और आर्थिक प्रगति के बीच संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। भारत को ऐसा राष्ट्र बनाने के लिए सामूहिक प्रयास करने होंगे, जो विश्व में सुख, शांति और मानव कल्याण का मार्ग प्रस्तुत कर सके। उन्होंने राष्ट्र निर्माण में प्रत्येक नागरिक की भूमिका पर जोर देते हुए कहा कि व्यक्तिगत, पारिवारिक, सामाजिक और व्यावसायिक जीवन में छोटे-छोटे सकारात्मक बदलाव भी देश की प्रगति में योगदान दे सकते हैं।

संघ के कार्यों और उसकी विचारधारा पर भी रखी बात

अपने संबोधन में भागवत ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यों और उसकी विचारधारा पर उठने वाले सवालों का भी उल्लेख किया। उन्होंने संघ के कार्य को समाज के प्रति सात्विक प्रेम, सेवा और संगठन की भावना से जोड़कर प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि पिछले 100 वर्षों से संघ समाज में आत्मबोध और राष्ट्रीय चेतना को मजबूत करने का प्रयास कर रहा है। शताब्दी वर्ष में हुए कार्यक्रमों को इसी दीर्घकालिक प्रयास का हिस्सा बताया गया। भागवत ने कहा कि भारत के सामाजिक जीवन में सकारात्मक बदलाव लाने के लिए केवल दूसरों से अपेक्षा करना पर्याप्त नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति को अपने आचरण में जिम्मेदारी, अनुशासन, सद्भाव और सेवा की भावना अपनानी होगी।

राष्ट्र निर्माण के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी

विजयादशमी उत्सव के अपने संबोधन के समापन संदेश में मोहन भागवत ने राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक आत्मबोध और समाज की सामूहिक शक्ति पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि देश की प्रगति के लिए समाज का संगठित, सक्षम और जिम्मेदार होना जरूरी है। उनके अनुसार, भारत का गौरव और वैश्विक स्तर पर उसकी प्रतिष्ठा केवल सरकारी योजनाओं या संस्थागत प्रयासों से नहीं, बल्कि नागरिकों की सक्रिय भागीदारी से मजबूत होगी। परिवार में संस्कार, समाज में समरसता, पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी, तकनीक का विवेकपूर्ण उपयोग और राष्ट्रीय कर्तव्यों का पालन इस दिशा में महत्वपूर्ण हैं।

आरएसएस के विजयादशमी उत्सव में दिए गए संबोधन का केंद्रीय संदेश यही रहा कि भारत की सांस्कृतिक पहचान और विविधता में एकता को मजबूत करते हुए आधुनिक चुनौतियों का सामना विवेक, नैतिकता, सामाजिक सहयोग और सामूहिक जिम्मेदारी के साथ किया जाना चाहिए।