- डीजीपी तदाशा मिश्रा की नियुक्ति को ले सरकार पर नियम तोड़ने का आरोप
- नेता प्रतिपक्ष ने पुलिस को राजनीतिक हथियार बनाने का आरोप लगाया
रांची (Threesocieties.com Desk )। झारखंड में नई पुलिस महानिदेशक (DGP) तदाशा मिश्रा की नियुक्ति को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है। पूर्व मुख्यमंत्री और नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने राज्य सरकार पर गंभीर आरोप लगाते हुए कहा कि डीजीपी की नियुक्ति में सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट दिशा-निर्देशों का उल्लंघन किया गया है।
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राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों का हवाला देकर झारखंड में डीजीपी नियुक्ति नियमावली में संशोधन किया और तर्क दिया गया कि राज्य में अनुभवी पुलिस प्रमुख की नियुक्ति अनिवार्य है, लेकिन कई वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर होने के कारण डीजीपी पद पर चयन हेतु… pic.twitter.com/dkIQqooiPo
— Babulal Marandi (@yourBabulal) January 16, 2026
मरांडी ने शुक्रवार को जारी प्रेस वक्तव्य में कहा कि राज्य सरकार ने जानबूझकर नियमों को तोड़-मरोड़ कर अपनी पसंद का अधिकारी नियुक्त किया है, जो न केवल संस्थागत परंपराओं के खिलाफ है, बल्कि पुलिस सुधारों की भावना पर भी सीधा प्रहार है।
“वरिष्ठ अधिकारियों की अनुपलब्धता का दावा भ्रामक”
बाबूलाल मरांडी ने सरकार के उस तर्क को पूरी तरह खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि वरिष्ठ आईपीएस अधिकारियों की अनुपलब्धता के कारण नियमों में संशोधन करना पड़ा। उन्होंने कहा कि यह दावा तथ्यहीन और जनता को गुमराह करने वाला है।मरांडी के अनुसार, झारखंड कैडर के डीजी रैंक के तीन वरिष्ठ अधिकारी — अनिल पालटा, प्रशांत सिंह और एम.एस. भाटिया — में से कोई भी केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर नहीं है। इतना ही नहीं, इन तीनों अधिकारियों की सेवा अवधि क्रमशः एक वर्ष, दो वर्ष और तीन वर्ष शेष है। इसके बावजूद वरीयता क्रम को नजरअंदाज कर उनसे कनिष्ठ अधिकारी को डीजीपी नियुक्त कर दिया गया।
“सेवानिवृत्ति से एक दिन पहले नियुक्ति सवालों के घेरे में”
मरांडी ने कहा कि सेवानिवृत्ति से ठीक एक दिन पहले डीजीपी की नियुक्ति करना सरकार की मंशा पर सवाल खड़े करता है। सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस प्रमुख की नियुक्ति को लेकर स्पष्ट निर्देश दिए हैं ताकि राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त, स्थायी और पारदर्शी व्यवस्था सुनिश्चित हो सके। इसके विपरीत, झारखंड में की गई नियुक्ति इन निर्देशों की भावना के खिलाफ है।
“पुलिस को राजनीतिक हथियार बनाने की कोशिश”
नेता प्रतिपक्ष ने आरोप लगाया कि राज्य सरकार पुलिस तंत्र का उपयोग केंद्रीय जांच एजेंसियों को डराने और दबाव बनाने के लिए कर रही है। उन्होंने कहा कि जब शीर्ष पदों पर नियुक्तियां नियमों को ताक पर रखकर की जाएंगी, तो निष्पक्ष पुलिसिंग की उम्मीद करना मुश्किल हो जाएगा।
“संस्थागत परंपराओं की रक्षा जरूरी”
मरांडी ने कहा कि डीजीपी जैसे संवैधानिक और संवेदनशील पद पर नियुक्ति पूरी तरह योग्यता, वरिष्ठता और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुरूप होनी चाहिए। इससे न केवल पुलिस बल का मनोबल बढ़ता है, बल्कि कानून-व्यवस्था पर जनता का भरोसा भी मजबूत होता है। उन्होंने सरकार से मांग की कि वह इस नियुक्ति पर पुनर्विचार करे और सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार पारदर्शी प्रक्रिया अपनाए।