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नई दिल्ली:18 साल के युवक की कंपनी ‘जेनरिक आधार’ से रतन टाटा ने की डील,50 परसेंट हिस्सेदारी खरीदी

  • पार्टनरशीप कंपनी सस्ती दवा बेचेगी
  • अर्जुन देशपांडे की खुरा कारोबार करने वाली स्टार्ट अप कंपनी

नई दिल्ली। टाटा ग्रुप के दिग्गज कारोबारी रतन टाटा ने 18 साल उम्र के लड़के से डील की है। मुंबई के अर्जुन देशपांडे ने 16 साल की उम्र में ‘जेनरिक आधार’ नामक स्टार्टअप कंपनी शुरु की थी। अभी कंपनी के दो साल हुए हैं। टाटा ने 18 साल के लड़के की दो साल पुरानी कंपनी में 50 परसेंट हिस्सेदारी खरीदी है। रतन टाटा ने मुंबई के अर्जुन देशपांडे की कंपनी ‘जेनरिक आधार’ में 50 परसेंट हिस्सेदारी खरीदी है। कंपनी सीधे मैन्युफैक्चरर्स से सामान लेकर रिटेलर्स को बेचती है। इससे रिटेलर्स की कमाई लगभग 20 परसेंट बढ़ गई है। वर्तमान में इस कंपनी का रेवेन्यू लगभग छह करोड़ रुपये हैं। कंपनी की नजर अगले तीन वर्षों में 150-200 करोड़ रुपये के टर्नओवर के टारगेट पर है।

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‘जेनरिक आधार’ कंपनी में 55 स्टाफ हैं, जिनमें फार्मासिस्ट,आईटी इंजीनियर और मार्केटिंग प्रोफेशनल भी शामिल हैं। जेनरेटिक कंपनी का अभी छह करोड़ रुपये का सालाना कारोबार करती है। जानकार सोर्सेज का कहना है कि सूत्रों के अनुसार,रतन टाटा ने यह इन्वेस्ट पर्सनल लेवल पर किया है।इस इन्वेस्ट का टाटा ग्रुप से लेना-देना नहीं है। रतन टाटा इसके पहले ओला,पेटीएम, स्नैपडील,क्योरफिट,अरबन लैडर, लेंसकार्ट और लाइबरेट जैसे कई स्टार्टअप में इन्वेस्ट कर चुके हैं। अजुर्न देशपांडे ने इस डील की पुष्टि की है। उन्होंने यह बताने से इंकार किया कि यह डील कितनी रकम में हुआ है। देशपांडे ने बताया कि बिजनेस टायकून रतन टाटा उनके पार्टनर बनना चाहते थे और कारोबार को चलाने के लिए उनके मेंटोर भी। अर्जुन देशपांडे के अनुसार ‘सर रतन टाटा ने दो दिन पहले ही जेनरिक आधार में 50 परसेंट हिस्सेदारी ली है। इस बारे में जल्द ही ऑफिसियल एलान किया जायेगा।
15 लाख रुपये से शुरू किया बिजनस

अर्जुन ने अपना स्टार्टअप शुरू करने के बाद तीन सालों में जेनरिक आधार को आगे बढ़ाने के लिए अपने फैंमिली से 15 लाख रुपए लिये। हाल में स्टार्टअप, मुंबई में 25 से ज़्यादा स्टोर्स के साथ मिलकर काम करता है।स्टार्टअप सीधे डब्ल्यूएचओ जीएमपी-प्रमाणित फ़ैक्ट्रियों से दवाइयां लेता है और कस्टमर्स को बाज़ार से सस्ती क़ीमतों में उपलब्ध कराता है।अब कंपनी की एनुअल छह करोड़ रुपये की सेल होती है। यह सीधे मैन्युफैक्चरर्स से जेनरिक दवाइयां खरीदती है और उसे खुदरा दुकानदारों को बेचती है। इसकी वजह से बीच में होलसेलर का करीब 16 से 20 परसेंट मार्जिन बच जाता है।

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कंपनी करेगी विस्तार
मुंबई, पुणे, बेंगलुरु और ओडिशा के लगभग 30 रिटेलर इस कंपनी से जुड़े हैं।प्रॉफिट शेयरिंग मॉडल को अपनाया गया है। जेनेरिक आधार का टारगेट आने वाले महीनों में एक फ्रेंचाइजी-आधारित मॉडल पर 1000 फार्मेसियों के साथ पार्टनरशीप करना है। एक सर्वे के अनुसार 60% इंडियन में अधिक कीमत के कारण उचित दवा नहीं खरीद पाते। गवर्नमेंट भी पिछले कुछ सालों से सभी तरह की जरूरी दवाओं के मूल्य में नियंत्रण लाने की कोशिश कर रही है। देश में लगभग 80 परसेंट दवाएं ऐसी बेची जाती हैं जिन्हें देश की ही 50,000 से अधिक कंपनियों द्वारा तैयार किया जाता है। ये कंपनियां लगभग 30 परसेंट से ज्यादा का मार्जिन लेती हैं। इसमें हॉलसेल व्यवसायी 20 परसेंट और रिटेलर का 10 परसेंट मार्जिन शामिल होता है।

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मां से मिली अर्जुन देशपांडे को प्रेरणा
18 साल के अर्जुन को अपनी मां से प्रेरणा मिली है, जो इंटरनेशनल फार्मा बिजनेस से जुड़ी हुई हैं। वह अपने स्कूल की छुट्टियों में अमेरिका,वियतनाम, चीन और दुबई जैसे देशों में जाया करते थे, जिस दौरान उन्हें ये कंपनी खोलना का आइडिया सूझा। वह बहुत से आयातकों,डिस्ट्रीब्यूटर्स और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों से भी मिलते थे,जिससे पता चला कि अन्य देशों में सस्ती दवाएं मिलती हैं। उन्होंने जब मां से पूछा कि भारत में दवाइयां महंगी क्यों हैं तो पता चला कि भारत में अधिकतर जेनरिक दवाएं ब्राड के जरिए प्रमोट की जाती हैं, इसलिए वह महंगी होती हैं।जेनरिक कंपनी के जरिए अर्जुन देशपांडे एक मिशन पर काम कर रहे हैं। वह चाहते हैं कि बुजुर्गों और पेंशनभोगियों को जरूरत की दवाई कम से कम कीमत में मिले। अर्जुन का आइडिया बिल्कुल यूनीक है। उनका मॉडल फार्मेसी-एग्रीगेटर बिजनस मॉडल है। अर्जुन देशपांडे ने कोरोना से जंग के लिए पीएम केयर्स फंड में तीन महीने की सैलरी भी दान की थी।

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