बिहार टेंडर घोटाला: असली सूत्रधार कौन? हाईकोर्ट ने ED-SVU से मांगा जवाब
बिहार टेंडर घोटाले में पटना हाईकोर्ट ने ED और SVU की जांच पर सवाल उठाए। छह वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका, प्राथमिकी और कार्रवाई पर जवाब तलब। अगली सुनवाई 27 नवंबर 2026 को।
Highlights :
- सरकारी टेंडर में कथित हेराफेरी और मनी लॉन्ड्रिंग मामले में हाईकोर्ट ने उठाएजांच एजेंसियों की कार्यशैली पर सवाल
- अदालत ने छह वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों की भूमिका की जांच और उनके खिलाफ कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट करने को कहा
- हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि याचिकाकर्ता कथित घोटाले का मुख्य सूत्रधार नहीं, बल्कि महज एक मोहरा हो सकता है
- विशेष निगरानी इकाई (SVU) के एडीजी को मामले में पक्षकार बनाकर शपथपत्र दाखिल करने का निर्देश दिया गया
पटना (Threesocieties.com Desk): बिहार में सरकारी टेंडरों में कथित हेराफेरी और करोड़ों रुपये की मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े मामले में पटना हाईकोर्ट ने जांच एजेंसियों की कार्यशैली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। अदालत ने छह वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों की भूमिका को लेकर स्थिति स्पष्ट करने का निर्देश देते हुए पूछा है कि जांच के दौरान सामने आए तथ्यों के बावजूद सभी संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं है।
न्यायमूर्ति सत्यव्रत वर्मा की एकलपीठ ने ऋषु श्री की अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान मामले के विभिन्न पहलुओं पर सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि प्रवर्तन निदेशालय (ED) की ओर से दी गई जानकारी के बावजूद छह वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका की जांच और उन्हें आरोपित बनाने के संबंध में स्थिति स्पष्ट नहीं है।
अदालत की टिप्पणी से सरकारी टेंडरों में कथित अनियमितताओं की जांच और उसमें शामिल लोगों की जवाबदेही का मुद्दा एक बार फिर चर्चा में आ गया है।
'याचिकाकर्ता महज एक मोहरा', असली सूत्रधारों पर सवाल
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने कहा कि उपलब्ध तथ्यों से ऐसा प्रतीत होता है कि याचिकाकर्ता कथित मनी लॉन्ड्रिंग और सरकारी टेंडरों में हेराफेरी का मुख्य सूत्रधार होने के बजाय महज एक मोहरा हो सकता है। अदालत की टिप्पणी का संकेत उन लोगों की भूमिका की ओर था, जिनके बारे में जांच के दौरान जानकारी सामने आने की बात कही गई है।
अदालत ने इस बात पर भी चिंता जताई कि मामले में कुछ लोगों को बचाने और कुछ को फंसाने की कोशिश होने की आशंका दिखाई देती है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि कानून की नजर में सभी समान हैं और जांच में किसी के साथ पक्षपात नहीं होना चाहिए। हालांकि, यह अदालत की प्रारंभिक टिप्पणी है। इससे किसी व्यक्ति या अधिकारी के दोषी होने का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। मामले में संबंधित व्यक्तियों की भूमिका का निर्धारण जांच और न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही होगा।
छह वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका पर क्या है सवाल?
सुनवाई के दौरान ईडी की ओर से अदालत को बताया गया कि उसने छह वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों के खिलाफ विश्वसनीय जानकारी साझा की थी। अदालत के समक्ष रखे गए विवरण के मुताबिक, इसके बाद तीन अधिकारियों—मुमुक्षु चौधरी, तरणी दास और उमेश कुमार—के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज हुई। लेकिन शेष अधिकारियों की भूमिका, उनके संबंध में जांच की स्थिति और उनके खिलाफ कार्रवाई नहीं होने के कारणों को लेकर स्थिति स्पष्ट नहीं हो सकी।
इसी बिंदु पर हाईकोर्ट ने जांच एजेंसियों से जवाब मांगा है। अदालत जानना चाहती है कि जब छह वरिष्ठ अधिकारियों के संबंध में जानकारी साझा की गई थी, तो सभी की भूमिका की जांच किस स्तर तक पहुंची और उनके खिलाफ कार्रवाई को लेकर क्या निर्णय लिया गया।मामले में छह अधिकारियों के नाम सामने आने का अर्थ यह नहीं है कि सभी के खिलाफ आरोप साबित हो चुके हैं। अदालत का जोर उनकी भूमिका और जांच की प्रगति को स्पष्ट करने पर है।
SVU के एडीजी को पक्षकार बनाने का निर्देश
पटना हाईकोर्ट ने मामले की गंभीरता को देखते हुए विशेष निगरानी इकाई (SVU) के अपर पुलिस महानिदेशक (ADG) को पक्षकार बनाने का निर्देश दिया है। अदालत ने उनसे शपथपत्र दाखिल कर कई महत्वपूर्ण सवालों का जवाब देने को कहा है।एडीजी को स्पष्ट करना होगा कि ईडी की ओर से छह वरिष्ठ अधिकारियों के नाम और उनसे संबंधित जानकारी साझा किए जाने के बावजूद सभी अधिकारियों को संबंधित प्राथमिकी में आरोपित क्यों नहीं बनाया गया।
इसके साथ ही, जांच के दौरान इन अधिकारियों की भूमिका को लेकर क्या तथ्य सामने आए हैं, इस संबंध में भी स्थिति स्पष्ट करनी होगी।हाईकोर्ट के इस निर्देश से अब एसवीयू की जांच और कार्रवाई का विवरण न्यायालय के समक्ष आने की उम्मीद है। एजेंसी के जवाब से यह स्पष्ट हो सकेगा कि संबंधित अधिकारियों के खिलाफ जांच किस दिशा में आगे बढ़ी है और कार्रवाई को लेकर क्या आधार अपनाया गया।
ED के जवाब पर भी अदालत ने उठाए सवाल
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने ईडी के जवाब को कुछ महत्वपूर्ण सवालों पर टालमटोल वाला माना। अदालत ने यह भी पूछा कि यदि जांच के दौरान अन्य अधिकारियों के नाम सामने आए थे, तो उनसे पूछताछ के लिए समन जारी क्यों नहीं किए गए।इस सवाल का संबंध जांच की निष्पक्षता और उसकी व्यापकता से है। किसी मामले में केवल एक व्यक्ति की भूमिका पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय जांच के दौरान सामने आए अन्य संभावित संबंधित व्यक्तियों की भूमिका की पड़ताल करना भी महत्वपूर्ण होता है।अदालत यह जानना चाहती है कि जांच एजेंसियों ने उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर क्या कदम उठाए और यदि कुछ अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई, तो उसके पीछे क्या कारण रहे।
अग्रिम जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान उठा मामला
यह पूरा मामला ऋषु श्री की अग्रिम जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान सामने आया। ईडी याचिकाकर्ता को सरकारी टेंडरों में कथित हेराफेरी के माध्यम से मनी लॉन्ड्रिंग का मुख्य सूत्रधार बता रही है। वहीं, सुनवाई के दौरान उपलब्ध तथ्यों पर विचार करते हुए अदालत ने अन्य संभावित संबंधित लोगों की भूमिका को लेकर सवाल उठाए। मामले में याचिकाकर्ता न्यायिक हिरासत में है। हाईकोर्ट ने एसवीयू से जवाब तलब करते हुए जांच की स्थिति और संबंधित अधिकारियों की भूमिका को लेकर स्पष्ट जानकारी मांगी है। अदालत के निर्देश के बाद अब जांच एजेंसी के शपथपत्र पर नजर रहेगी। इसमें सामने आने वाले तथ्यों के आधार पर मामले की अगली सुनवाई में आगे की कार्रवाई पर चर्चा हो सकती है।
27 नवंबर को अगली सुनवाई
पटना हाईकोर्ट ने मामले में एसवीयू के एडीजी को शपथपत्र दाखिल करने का निर्देश देते हुए अगली सुनवाई की तारीख 27 नवंबर 2026 निर्धारित की है। सुनवाई दोपहर तीन बजे होगी। अगली सुनवाई में जांच एजेंसियों को छह वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका, प्राथमिकी में उनके नाम शामिल किए जाने या नहीं किए जाने के कारणों और जांच के दौरान सामने आए तथ्यों पर स्थिति स्पष्ट करनी होगी।
अब सबकी नजर अगली सुनवाई पर है, जहां एसवीयू के जवाब से सरकारी टेंडरों में कथित हेराफेरी और मनी लॉन्ड्रिंग मामले की जांच से जुड़े कई सवालों पर स्थिति साफ होने की उम्मीद है।
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